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लघु कथा : डॉ. बीना सिंह ‘ रागी ‘
🌸 हरामखोर
– डॉ. बीना सिंह ‘ रागी ‘
[ भिलाई छत्तीसगढ़ ]
आज सवेरे दमयंती जी अपने बालकोनी में हल्की-हल्की धूप में ईजीचेर डालें आंख मूंदकर अपने विचारों में मग्न थी आंखों से टप टप चार बूंदे आंसु के अनायास गालों में चू रहे थे झाड़ू लगाते लगाते अचानक अनारो की नजर मालकिन के चेहरे पर गई आंसु देखते ही वह बोल पड़ी अम्मा जी आप क्यों रो रही हैं आवाज सुनते ही हड़बड़ा कर दमयंती जी ने आंखें खोली अरे कुछ नहीं अनारो मेरी एक सहेली की हालत अच्छी नहीं है उसकी याद आ गई जबकि सच तो बात यह थी कि स्वयं दमयंती जी की हालत सही नहीं थी मानसिक रूप से काफी आहत हुई थी
बीती रात की घटना ने बहुत चोट पहुंचाया बात कुछ यूं हुआ पति दिवाकर जी की बाहर पार्टी में खा खा कर पेट खराब हो गया था इसी वजह से 2 दिनों से खिचड़ी और दलिया घर में बन रहे थे और दमयंती जी को खांसी आ रही थी इसलिए उसने अनारो से कहा मेरे लिए 3 रोटियां बना कर हल्का सा मक्खन या घी लगाकर रख देना ताकि वह सूखे नहीं मुझे जब भूख लगेगी मैं खा लूंगी
खाने की टेबल में खाने के बाद दिवाकर जी ने देखा कि मेरे लिए दलिया और अपने लिए रोटी घी लगा हुआ तो वह आग बबूला हो गए और चीखते हुए बोले
हरामखोर खुद के लिए घी लगी हुई रोटी मेरे लिए यह दलिया अपने खानदान से यही सीख कर आई है पति को रुखा सुखा खिलाकर खुद ऐश करो हालांकि दमयंती जी के लिए ऐसे शब्द कोई नया नहीं थे लेकिन अब इस उम्र की चौथापन पड़ाव में ना जाने क्यों बहुत आहत होने लगी है आंखों से निरंतर अश्रु धारा बहते रहते हैं शायद अब सोचने और रोने के सिवा कोई काम नहीं रह गया बच्चों की परवरिश घर गृहस्ती को आगे बढ़ाने के लिए दमयंती जी खुद भी नौकरी किया करती घर बाहर दोहरी जिंदगी में इतनी व्यस्त रहती कि ऐसे कटु शब्द और गालियां का मंथन करने के लिए उसके पास वक्त ही नहीं रहता था एक ही लक्ष्य था बच्चों को पढ़ाना है आगे बढ़ाना है ऊंचे ऊंचे ओहदे पर बिठाना है सोसाइटी में घर मकान गाड़ी के साथ स्टैंडर्ड मेंटेन करना है सब कुछ तो किया मैंने एक साधारण मध्यम क्लास इंसान की शौक चाहत जो होनी चाहिए वह करीब करीब पूरे हो गए बच्चे दोनों अपनी अपनी जगह में सेटल हो गए बहुत कुछ बदल गया जो नहीं बदला वह दमयंती तेरी किस्मत वह यही सोच रही है पिछली रात से कि मैंने तो कभी भी हराम का नहीं खाया ना ही आराम फरमाया हमेशा मेहनत की घर और बाहर यहां के हर चीज में जितना दिवाकर जी का योगदान है उतना ही मेरा भी है बल्कि उससे कहीं ज्यादा है मेरा फिर मैं हरामखोर कैसे?
पूरी घटना सुनने के बाद अनारो भी भावुक हो गई उसने दमयंती जी से कहा मैडम जी आप अपनी सहेली को कहिए मन छोटा ना करें किस्मत का यही लिखा मानकर अपने को समझाएं कि उसने तो कुछ बुरा नहीं किया सामने वाला बुरा कर रहा है जो जैसा करेगा वैसा पाएगा इतना सुनकर भी दमयंती जी खुश नहीं हुई वह फिर से विचारमगन हो गई हमारे साथ तो हमारे घर वाले ने बहुत बुरा किया है इसे बहुत कष्ट होगा एक और दर्द वह धीरे-धीरे घुटना पकड़ के इजी शेयर से उठी और अनार से कहा जल्दी से झाड़ू पोछा का काम निपटा लो साहब के लिए कुछ ताजा नाश्ता बना दो.
•संपर्क –
•62663 38031
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chhattisgarhaaspaas
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