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27 मई डॉ. बलदेव की 82 वीं जयंती के अवसर पर विशेष काव्य संग्रह : वृक्ष में तब्दील हो गयी औरत- लेखक डॉ. बलदेव

2 years ago
597

•पुनरपाठ
•डॉ.बलदेव : सृजन और सरोकार
•रजत कृष्ण

छत्तीसगढ़ के अपनी लेखनी से पूर्वी हिंदी की छत्तीसगढ़ी भाषा और खड़ी बोली में समान रूप से लेखन सृजन करने वालों में महत्वपूर्ण नाम है डाँ. बलदेव आज की नई पीढ़ी के लिए डाँ. बलदेव भले ही कोई चमकता हुआ नाम न हो लेकिन छत्तीसगढ़ के जिन मसिजीक्यों ने हिंदी जगत को अपनी लेखनी के ताप और जीवन संघर्ष के उदात्त रुप से प्रभावित किया है उनमें यह एक बड़ा नाम हैं। इधर पिछले कुछ दिनों से उनकी हिंदी और छत्तीसगढ़ी कविताओं के पठन का सुअवसर मिला और जो डूबा तो डूबता ही चला गया।

“सूर्य किरण की छाँव में”,”वृक्ष में तब्दील हो गई औरत”‘ एवं “खिलना भूलकर”संग्रहों की कविताएं पढ़ते हुए जिस कवि से हमारी मुलाकात होती है वह एक ऐसा संवादी और जन सरोकार वाला कवि है जिसने जीवन संघर्ष और समाजिक सरोकार को ही अपनी कविता के केंद्र में रखा ।जिन दिनों बलदेव साव लेखनी क्षेत्र में आए वह हिंदी काव्य जगत में नई
काव्य चेतना और नव्य सामाजिक सांस्कृतिक सरोकार के मूर्त होने का दौर था।उन्नीस सौ साठ-सत्तर का वह दशक आजादी के लम्बे अंतराल के बाद भी मजदूर -किसान और कारीगर वर्ग के लिए कोई बहुत आश्ववस्तकारी वातावरण निर्मित करने में असफल था, नतीजन एक अराजकता, नाराजगी तथा आत्महंता प्रवृत्ति को जन्म दे रहा था।बलदेव साव एक सजग और दृष्टि सम्पन्न कवि की भूमिका का निर्वहन करते हुए तब लिख रहे थे-

” समय का केंचुल अभी अभी उतरा
उजला धुला दिन हुआ विषहरा
भरी दोपहरी अंध ,कूप में सूरज डूब मरा।
धुंधवाने लगी दिशाएं, लगी आग झोपड़ी में
झुलस गया नंदन कानन हरा भरा।”( पृ. 37)

सूरज के डूब मरने और नंदन कानन के झुलस जाने का बिम्ब तात्कालीन दौर की विसंगत जीवन स्थितियों वाले देश और समाज का असल चरित्र सामने लाता है।डाँ. बलदेव की कविताएं इस नाते अपना विशिष्ट स्थान अपने शुरुआती दौर से हिंदी जगत में बनाती आई हैं कि कहीं भी कभी भी वह हवा में गुम होने वाले स्वर और मन मस्तिष्क से ओझल होने वाले दृश्य बिम्बों की लड़ियाँ मात्र नहीं होती है।वह होती हैं तो जड़-मूल अपनी धरती और अपने परिवेश से लिपटी और धंसी-पसरी हुई।अपने समय से संवाद करती और अपने काल के यथार्थ से टकराती हुई,सृजन आवेग से भरी, डाँ. बलदेव कहते हैं-

” पिंजरे में बंद हुए/रात दिन रटे हुए
सुग्गे हैं सिर्फ हम नहीं/कोयल हैं हम
अपने स्वर में फूटेंगी कोंपलें
आयेगी आमों में बौर।
कब तलक नकारती रहोगी तुम हमें
ओ मेरी सूर्यमुखी तुम! (पृ.18)

नई कविता के तर्ज में नवगीत का एक दौर हिंदी काव्य में चला और उसमें तात्कालीन दौर के अधिंकाश कवियों ने हाथ आजमाया।बलदेव साव ने बड़ी मात्रा में नवगीत रचे और अपनी प्रतिभा का विस्तार किया। उनके गीतों में जहाँ प्रकृति की छटा उभर -खिलकर सामने आई ,वहीं जीवन के राग-रंग और माधुर्य भाव सघनता के साथ उभरता गया, तथा-

संध्या कुल पोखर में उमगती
बह चली मधुमास की गंध-हवा
वनराजियों को हिला अभिसार में
बांसुरी के स्वर थिरकते
कोयलों की घाटियों में
डूबता गहरा रहा अंधकार में।”

डाँ. बलदेव की गीतात्मकता की सबसे बड़ी विशेषता जो प्रभावित करती है वह यह कि कविता और गीत की अंतर्संगति से उनकी रचना में एक नए तरह का लालित्य उत्पन्न होता है, यथा-

‘”तुम तो अपनी राह लौट जाओगी
और प्यास भटक जावेगी
नीली घटा
पनघट में शोर न करो।
बजता है जलतरंग/थिरक रहा अंग-अंग
इन्द्रधनुष गहरा है लजवन्ती
शरबती हिलोर न करो
मौसम गाता है/मैं मेरा प्यासा है
आज उमस ज्यादा है रसवंती
और अधिक देर न करो। (पृ.26)

जिन दिनों यह गीत रचे जा रहे थे वह दौर हिंदी साहित्य में नई चेतना और नए स्वर के साथ साथ नए सामाजिक-सांस्कृतिक वातावरण के चलते नए प्रयोग की कविता के क्षेत्र में बढ रहे थे। नए पन के अतिरिक्त आग्रह के चलते कवियों/गीतकारों का एक बड़ा वर्ग गद्य कविता जैसे नारे भी उछाल रहे थे और सिरज भी रहे थे. लेकिन डाँ. बलदेव का अपना स्वर और अपनी भंगिमा थी- सहज और तरल भाव संवेदना से निःसृत पदबंधों वाली यथा-

“नहीं
कोई नहीं यहाँ
बड़ी- बड़ी बूंदों की बौछार
या अल्लाह!
नहीं
यहाँ कोई नहीं
शहर था समुद्र की ओर/डूबते हैं
नारियल के गाछ/या अल्लाह। (पृ.28)

एक सजग कवि अपनी नदी, अपने पहाड़, अपने जंगल आदि सभी कुछ से ठीक उसी तरह संवाद करता और उनसे गलबहियाँ करते हुए जीता है जिस तरह से अपने जनपद के जन से घुल-मिलकर जीता है।इस वस्तु सत्य के आलोक में बलदेव साव का कवि
सौ टंच खरा उतरता है।केलो नदी से बतियाते हुए कहते हैं-

” अरी ओ केलो/मुझे अपनी बाहों में ले लो!
जब भी देखा तुमको/बौराया मन
सोन तरी से टकराकर /दरक गया दरपेश
हँसी -फूटती चट्टानों से
कहा पवन ने/संग हमें भी ले लो

कवि की अपनी धरती, आकाश, पेड़,धूप,बादल से जुड़ने का भाव-बिंम्ब उसके काव्यात्मक उपादान मात्र नहीं होते, दरअसल वह एक कवि का मनोजगत उसकी मिट्टी-पानी और परिवेश के चरित्रों व सरोकारों से जुड़ाव को ही दर्शाता है। डाँ. बलदेव साव इस परिप्रेक्ष्य में एक महत्वपूर्ण कवि साबित होते हैं।।यह साबित होना कवि की “पहाड़”कविता में एक नये विस्तार के साथ सामने आता है यथा-

“मैं हूँ धूप गढ़ का/धूप का टुकड़ा
मत लजाओ/पास आओ

बजने दो अन्धेरे को/झिलमिलाती लहरों पर
चढ़ने दो आग की नदी/गिरी शिखरों पर

उतरने दो/बहने दो
अपनी गहराइयों में/अतल गहराइयों में।।
(पृ.32)

डाँ. बलदेव की कविता का एक महत्वपूर्ण पक्ष है जीवन की अतल रहस्यमयता को बूझना-बाँचना। यह काम आप निरंतर करते हैं। उनके इस उपक्रम को यहाँ हम बेहतर बाँच सकते हैं जब वे चौहत्तर पंखुड़ियों वाले गुलाब के प्रति” एक और गीत में कहते हैं कि-

“कितना जाना है/पथ यह अनजाना है
जंगलों के पार जंगल/लहराता नीला समुंदर
हरीतिमा की वादियों में/खो गया दिन का कलेंडर
फिर लटका ठूंठ पर है/जुगनुओं का क्या भरोसा
फिर भी तो जाना है।। (पृ.35)

विकट स्थितियों और अनजाने पथ पर भी पूरी प्रतिबध्दता के साथ जीवन यात्रा को जारी रखना कवि बलदेव की वैचारिक दृढ़ता और कर्म के प्रति प्रतिबद्धता को दर्शाता है। समाज में एक खाया-पीया अघाया वर्ग जब सब सहुलियतें अर्जित करके भी जीवन को समाज से अलगाए और वैचारिक पक्षधरता को स्वार्थ की पन्नियों में लपेट हुए जीवन जीता है तब डाँ. बलदेव जैसे कवि का यह स्वर समाज को श्रम का संघर्ष का संस्कार देता है-जिसकी पहले जितनी जरूरत थी,उतनी ही जरूरत आज भी है।

एक सजग कवि अपने समय का सबसे बड़ा प्रवक्ता और सचेतक भी होता है।कवि चाहे किसी भी काल खण्ड का हो,यह उसकी नैतिक जिम्मेदारी होती है कि वह सत्ता का नहीं जनता का पक्षधर हो और उसके स्वर में जनता का दुःख -दर्द निःसृत हो। “समय का केंचुल “कविता सिरजते हुए डाँ. बलदेव स्वतंत्र भारत में बढ़ती गई विभ्रम स्थितियों और स्वार्थ के पंख पसारे समय का केंचुल धारे चरित्रों की परख करते, यथास्थिति से अवगत कराते हुए निर्वहन करते हैं समय सजग कवि की अपनी भूमिका का उनके शब्द हैं-

“धुंधवाने लगी दिशाएँ, लगी आग झोपड़ी में
झुलस गया नंदन कानन हरा भरा…।’

“समय के केंचुल”को बांचने -परखने वाले कवि बलदेव दरअसल कविता के जनपद में जीने वाले एक ऐसे सजग और समर्थ कवि की अपनी भूमिका में सदैव आगे रहते हैं जिन्हें अपनों की पीड़ा का पूरा पूरा पता है।और पता है यह भी कि ऐसे बखत में जब लोग “अपनी माटी’ को भूल रहे हों,’जड़’ को भूल रहे हों, तो जरूरी यह है कि कैसे अपनी माटी की पीड़ा को अपने भीतर जीया जा सके और उसके असल रूप को बाँचा-बचाया जा सके कि अपनी मुकम्मल पहचान कभी गुम न हो कवि बलदेव का स्वर है-

“चेहरा माटी का
खुशियों में तो गाए ही गाए
दर्द में भी जो इतना मीठा गाए
कि पतझड़ की लाल-लाल टहनी पर
हरे-हरे ललछौंहे कोंपल फूटे।

डाँ. बलदेव एक किसान पुत्र थे,जिनके लिए माटी से बड़ा धन और क्या हो सकता था!जब बलदेव जी अपनी इस कविता के अंत में कहते हैं-

“चेहरा,वह इतना काला
इतना काला स्वयं विधाता
समझ न पाये जिसकी भाषा
गढ़ देना गढ़ देना माँ
ऐसा ही चेहरा माटी का…।”

तब स्पष्ट हो जाता है कि छत्तीसगढ़ का दुलरवा बेटा अपनी माटी के प्रति कितना जुड़ा-बंधा हुआ है और कितना वह आभारी है अपनी छत्तीसगढ़ महतारी के कोख के प्रति।

आज जबकि कवियों का एक बड़ा वर्ग अपनी बौध्दिक जुगाली और शैल्पिक कलाकारी के बूते सुघ्घर दिखती सी कविताएं रचने और मंचों में वाह वाह सुनने भर में अपने कर्म की सार्थकता देखता -समझता हो तब बलदेव साव होने का क्या महत्व है-यह बांचा-बूझा जा सकता है।

बलदेव जी का कवि छंदमुक्त कविता में जितना रमा है उतना ही गीतात्मक भाव संवेदना में भी।बलदेव जी का कवि ‘नई कविता’ और ‘गीतात्मक कविता’ में निरंतर आवाजाही करते हैं। दरअसल जिस दौर में डाँ. बलदेव सृजनरत रहे उस बखत नवगीत का पाठक बड़ी संख्या में रहा है और मंचों में पढ़ी जाने वाली कविता का एक बड़ा हिस्सा ऐसे कवियों की सिरजी हुई थी,जो तुकांत होती और जिनका सस्वर पाठ मंचों से किया जा रहा था।

यों डाँ. बलदेव अपनी तुकांत कविताओं में सिर्फ तुक मिलान का ध्येय लिए हुए आगे नहीं बढ़ते थे,बल्कि शब्द चयन और दृश्यबंध के प्रति काव्यात्मक गांभीर्य भी होता था-जो उन्हें तुकांत कवियों की भीड़ से अलग भाव तार्किकता और संवेदन सजग कवि बनाता था-जिसमें गीतात्मकता तो थी, लेकिन उस गीतात्मकता में लिजजिलापन कैशोर्य भावुकता और महज तुक मिलान से काम चला लेने की बजाय भावों का गांभीर्य और लय में अन्तर्संगति भरा रचाव प्रबल पक्ष था। इस तथ्य को हम ‘गाँव’ कविता के निम्नांकित बंधों में देख-परख सकते हैं-

“जब गाएँ रंभाती हों,बछड़े उछलते और मचलते हों
और मचलती हुई जवानी सूनी आहें भरती हों
जब अलस्सुबह धुआं दूध सा धुला हुआ हों
किसी पेड़ पर चढ़ सूरज लंगूरे सा करतब करता हो

जब गाएँ रंभाती हों,बछड़े उछलते और मचलते हों
डंगसी पर बैठा कौवा जब अंगाकर की रोटी खाता हों
तब आना जी मीत हमारे गाँव में
जी भर कर लिखना गीत बैठकर सूर्य किरण की
छांव में
(पृ.40/41)

नवगीत के दौर में रची यह रचना और अन्यान्य कई गीतात्मक कृतियाँ कवि बलदेव की उस अप्रितम प्रतिभा और सृजनात्मक औदात्य का श्रेष्ठ उदाहरण लगती हैं जिसके जड़-मूल में लोक संवेदना से पगी भाषा और बनक का अद्भुत संयोग है। ‘डंगसी’, ‘अंगाकर’,’उड़ौनी’,जैसे ठेठ-देशज शब्द और पदबंध डाँ. बलदेव की कविता और गीत में जैसे सहज ही आते हैं और वह अपने समय के जड़ाऊ कवि गीतकारों से इतर सहज रचाव और बनाव के कवि रुप में अलग से चिन्हाते हैं।उनका यह चिन्हाना उनकी भाषाई अलल्दापन का द्योतक है।

नवगीत का प्रभाव डाँ. बलदेव के कवि मन में गहरा रहा है, जिसमें सबसे खास यह है कि वे प्रकृति के तमाम अवयवों को बड़ी सुगढ़तापूर्वक अपनी रचनाओं में संइतते-बउरते हैं, जैसा कि ‘यह सांवला दिन’ की यह पंक्तियाँ “काश यह सांवला दिन अपने साथ ले जाते’

सूरज को जूड़े में बार बार खोंसती रही,
लेकिन वह पंखुरी-पंखुरी
पल छिन झरता चला गया
काश, जाने के पहले कुछ तो कह जाते

रात के स्याह अँधेरे में मुझसे कई बार गये हो
और धुंधलके होने के पहले लौट आये हो
काश,आज भी लौट आते…..।।(पृ.45)

डाँ. बलदेव के अन्य गीत जब हम पढ़ते हैं तो सहज ही स्पष्ट होता है कि उनका कवि और गीतकार अपनी बनक और भंगिमा में सतत संवेदना के नये क्षितिज तलाशते हैं।नए दृश्य बिंम्ब सिरजते हैं।”एक चाँद दरक गया”शीर्षक गीत में सृजित यह दृश्य बंध दृष्टव्य है-

‘एक चांद दरक गया
दर्पण का व्यक्ति जो अपने से तन्मय था
दूर तक भटक गया

एक फाँक चन्द्रमा
बादलों की झील में धँसा
दूसरा माझी के रेशमी जाल में फँसा
खिलखिला कर तीसरा आदमी की भीड़ में हँसा

दर्पण के व्यक्ति की ‘तन्मयता’ और फिर उसका भटकाव यथार्थ और कल्पना के उस व्दंव्द का सटीक उदाहरण है जो हम सभी के जीवन का भी यथार्थ होता है।

डाँ. बलदेव की कविताई में हम जितना उतरते जाते हैं उतनी ही ‘नई छवियाँ’ और ‘काव्य युक्तियों हमें दिखाई देती है। बिंबों का वैशिष्टय और कहन की अपनी शैली ईजाद करते हुए अपने काव्य क्षितिज को नई ललाई देते दिखते हैं। संयोग और वियोग के भाव की ऐसी नितांत मौलिक छटा स्वतः यह सिध्द करती है कि डाँ. बलदेव एक अन्वेषी कवि थे और अपना मुहावरा अपना छंद बंध अपना शिल्प आप गढ़ने का हुनर उन्हें आता था, यथा यह काव्यांश देखें-

‘ लहराये जब भी आँखों में मतियाया सागर
ढहे, क्षण भर में आंसुओं के नौ महले
ढही प्रतिबिम्बित जानी अनजानी छवियाँ..।

‘मटियाया’ शब्द ठेठ छत्तीसगढ़ी का है, जिसे डाँ. बलदेव ने ऐसा उपयोग यहाँ किया है कि पूरा पदबंध छत्तीसगढ़ियाँ आँच से दमक उठा है।कवि चाहे कोई भी हो जनपद का हो-उसकी कविता में उसकी माटी की महक और भाषा -वाणी की दहक महसूस न हो तो फांक दिख ही जाती है।जाहिर है डाँ. बलदेव जी जड़मूल अपनी माटी से गुंधे-बिंधे कवि थे-जो उन्हें औरों से अलग पहचान देता है।

एक समय सजग कवि की बड़ी पहचान होती है कि वह अपने समय की राजनीतिक स्थितियों – परिस्थितियों के साथ ही साथ ‘सत्ता तंत्र’को चलायमान रखने वाली शक्तियों की दशा-दिशा कैसी है और उनके राजनीतिक व व्यवस्थागत ध्येय क्या है, इसे जाँचे और परखे। डाँ. बलदेव इस परिप्रेक्ष्य में खुली आँखें और पारखी दृष्टि सम्पन्न कवि रहे। ‘कालिदास के बादल’ कविता में वह जिस यथार्थ चित्रण आज से सालों पहले कर चुके हैं वह आज भी जस का तस नजर आता है. यथा-

‘बादल बरसा नहीं न लौटा गाँव
मैं हुआ हैरान
सोचा होगी देश की समस्याएं अनेक
मित्र लगा होगा निपटने को नेक
कहाँ मिलती होगी फुरसत
हो सकता है दिल्ली के रंगीन नजारों
में डूबा हो
हो सकता है संसद में ही गरज रहा हो
संभव है लाल किले में बरस रहा हो
मैंने पूछा यार देहात नहीं चलते हो
पढ़ा नहीं क्या समाचार है
वहाँ पूरा अकाल है
खेतों में पड़ी दरार है
नदियों में बहती नहीं धार है!

गाँव -जनपद की जिस पीड़ा को डाँ. बलदेव ने सालों पहले देखा-बाँचा और राजनीतिक व्यवस्था के रहनुमाओं की घोर उदासीनता को रेखांकित किया था उसका आज भी जस का तस नजर आना हमारी व्यवस्था की घोर नाकामी का उदाहरण है। डाँ. बलदेव एक दूरदर्शी कवि थे।जन की पीड़ा को देखने-बांचने का उनका अपना ढंग था। वे यह बेहतर जानते और पहचानते थे कि जब तक हमारी राजनीतिक व्यवस्था और राजनीति से जुड़े लोगों में शुचिता का संस्कार नहीं होगा व्यवस्था और सत्ता में आशातीत बदलाव संभव नहीं है। डाँ. बलदेव ने बड़ी ही तिक्त भाषा और कटाक्ष शैली में कहने को बाध्य होते हुए तब लिखा अपने समय की सत्ता और राजनीति में बैठे-पैठ चरित्रों को इंगित करते हुए यह कि-

‘आओ वहशी जिंदगी जीएं
क्षण भर को नितांत वाहियात हो जायें
पुल के नीचे फूहड़ हँसी हँसे
या उड़ते हुए कबतरों को निशाना साधें
हीरो की असफलता पर
अश्लील गालियाँ बकें
और हिरोइन के रोमांच पर जोर से सीटियां बजायें
या लगातार भूकें /हो सके तो आग लगाएँ
जुलूस निकालें/तोड़-फोड़ करें…। (पृ.63)

‘युवा तुर्क’शीर्षक से रची कविता का यह अंश तब तक का यथार्थ व्यक्त करता है जब आपातकाल लगा दिया गया था और ‘लोकतंत्र’के स्वर को पिंजरे का तोता बना कर स्वार्थ की राजनीति को पोसा-पाला जा रहा था। जाहिर है कि डाँ. बलदेव तब लोकतंत्र के इस संकट काल में सत्ता के नहीं बल्कि जनता के पक्ष के कवि थे-जो किसी भी जन पक्षधर कवि की असल पक्षधरता होती है!

‘वृक्ष में तब्दील हो गई औरत’ डाँ. बलदेव की दूसरी काव्य कृति है।इस संग्रह की पहली कविता है-‘कविता’
,यह कविता डाँ. बलदेव की दृष्टि और उनकी संवेदनात्मक सरोकार का मुख पत्र कहा जा सकता है। पूरी कविता यहाँ हम पढ़ें और यह जाने-समझे व महसूस करें कि डाँ. बलदेव कितनी शिद्दतपूर्वक कविता को जीते रहे हैं ताउम्र-

“दरअसल कविता आँख है जिसमें
भीतर की दुनिया/बाहर दिखाई देती है
दरअसल कविता/हथियार है/जिसमें
बाहर की लड़ाई/भीतर लड़ी जाती है
दरअसल कविता क्या है? कविता है
या आँख या हथियार/दरअसल
कविता/एक नन्हीं गौरया है
जिसकी चोंज में/सारा आकाश है।”

कविता की ऐसी अर्थगर्भित और व्यापक परिभाषा रचते हुए डाँ. बलदेव ने एक तरह से अपने कवि और सभी कवियों के सरोकार और सृजन-धर्मिता के आयामों को ही बड़ी शिद्दत पूर्वक उद्घाटित किया है। ‘कविता में आँख’हो जाना’हथियार हो जाना’और गौरया का आकाश हो जाना’ यह दर्शाता है कि कविता का गहरा संबंध जीवन जगत के सरोकारों से है। अब वही कविता यहाँ चल सकती है जिसमें जीवन की धड़कन हो, सामाजिक सरोकार और व्यापक जनचेतना युक्त विषयवस्तु हो और हो संघर्ष का माद्दा भी।

यह दौर कला के जीवन निरपेक्षता का नहीं बल्कि जीवन सापेक्षता का है जहाँ जीवन है वहाँ कविता है और जहाँ कविता है वहाँ जीवन की छवियाँ अपने पूरेपन के साथ होना जरुरी है. डाँ. बलदेव की कविता पक्षधर जीवन की कविता के रूप में हमें मिलती है, जिससे आश्वस्ति होती है कि असल कविता वही होगी जिसमें कवि का पूरा परिवेश, वर्ग और समाज की धड़कन बोलती हों। ‘लैण्ड स्केप’कविता रचते हुए डाँ. बलदेव अपनी भूमिका का जैसे ‘ब्लू प्रिंट’ सामने रख देते हैं इस तरह-

“अब तो बिस्तर छोड़ना ही होगा
इस प्रगाढ़ अन्धकार के/निष्कम्प जल
और अन्तहीन शून्य के बीचों बीच
हाँ,अब मैंने/मिट्टी का एक सुनहला ढेला
रख दिया है।
इस छोटे से कैनवास पर
एक बहुत बड़ा लैण्ड स्केप/आँखें खोल रहा है

यहाँ स्पष्ट है कि डाँ. बलदेव जीवन राग के बड़े समर्थ और जरूरी कवि हैं जिन्हें कविता और मनुष्य समाज की उस अतंर्संगति का गहरा बोध है जिसके बूते ही यह धरती हरी-धानी कहलाती है और जहां जीवन के रंग रूप अपनी प्रखर किरणों के साथ आकार लेते हुए हमें पाठ पढ़ाता है जीवन गति का।इस कविता के अंतिम में डाँ.बलदेव कहते हैं-

‘अब तो बिस्तर छोड़
कैनवास के सामने जाना ही होगा
सूर्य नमन के लिए।”

किसनहा पूत डाँ. बलदेव जानते है ‘सूर्य नमन’ हमारा संस्कार ही नहीं बल्कि जीवन की अनिवार्य धड़कन है-डाँ. बलदेव का अपने गाँव जनपद,नदी-पहाड़ और जंगल से गहरा नाता रहा है।जंगल-पहाड़ उनके लिए पिकनिक स्पाट नहीं बल्कि जीवन पथ का संगी और सहोदर सा है। नाल गडे़ पुरखों की माटी से गलबहियाँ करने सा है विकट संघर्ष करते हुए इनकी जड़ों को बचाए रखने का उद्यम सा। ‘सिंसरिंगा की घाटियाँ’कविता सिरजते हुए कहते हैं-

“बीजा-साजा-साल के
छाँव में चितकबरे शशक-शावक सा
लुक-छिप कई मोड़
मांद नदी तक छलांगती
नील गाय सी बग छूट कहीं पर भागती
चढ़ती उँची चट्टानों पर उतरती
नीची ढलानों पर/ सिंसरिंगा की घाटियाँ
कभी आगे कभी पीछे से
लहराकर तेजी से लिपट जाती
पथिक के पाँव में

मनुहार करती क्षण भर विलम जाने को
करील कुंज की छाँव में….। (पृ.75-76)

यह अकारण नहीं है कि संबंधित कविता से जुड़ते हुए हमें ‘सतपुड़ा के घने जंगल’कविता सिरजने वाले भवानी प्रसाद मिश्र याद आते हैं।यह जुड़ाव अपने पुरखे कवियों का अनुकरण नहीं बल्कि परंपरा विस्तार की तरह हमें मिलता है।जाहिर है डाँ. बलदेव की कविता अपने ताप ,तेवर और सरोकार में विरासत को समृद्ध करने का सृजनात्मक उद्यम सहज ही दिखाता है-जो हिंदी कविता में प्रकृति केंद्रित कविता की भाव संवेदना की धारा को जीवंत बनाए रखने का अनुकरणीय उदाहरण है।

हिंदी व अन्य भारतीय कविता में आजादी के पश्चात एक दौर मोह भंग का था जिस कालखंड में बड़ी मुखरता पूर्वक प्रतिरोधी कविता सिरजी गई।नागार्जुन,धूमिल, गोरख पाण्डे, पाश जैसे कवियों ने जनपक्षधरता और सत्ता विरोधी कविताएं सिरजते हुए अपने सपनों के लोकतंत्र के बिखराव पर कड़े स्वर में आंदोलन सा छेड़ दिया था-जिसका प्रभाव सभी तरफ दिखाई दिया।यहाँ छत्तीसगढ़ में भी इसे डाँ. बलदेव जैसे कवि की कविता में मुखरित पाते हैं।अपनी एक कविता’घोषणा पत्र’ में तब डाँ. बलदेव ने लिखा था-

“हमें दुख है आप मत लड़िये
हमारी नंगी पीठ पर पोस्टर लगाने के लिए
आप झूठ मत बोलिए, गरीब देश के नाम पर
कुर्सी के सामने पार्टियाँ या देश क्या चीज है
आप में चाहे कोई जीते पर यह मानना गलत
होगा
कि हमनें आपमें से किसी को चुना है
क्योंकि हमने जिसे चाहा
उसके पास आदमी होने की तमीज नहीं है।
हमनें अँधेरे में एक कागज का टुकड़ा छोड़ा है
यह आपके लिए एक घोड़ा है।। (पृ.81-82)

इससे बड़ी विडम्बना भला क्या हो सकती है किसी भी लोकतांत्रिक व्ववस्था के लिए कि जिस भरोसे और स्वप्न के साथ वह अपना प्रतिनिधि चुनता है वह प्रतिनिधि पदासीन होते ही अपने मूल कर्तव्य और जिम्मेदारियों को भूल कर स्वहित एवं पूंजी अर्जन में ही इस कदर डूब जाता है कि जनता की नंगी खुली पीठ और भुखाया पेट भी दिखाई नहीं देता!

जाहिर है डाँ. बलदेव जड़मूल जन और जनपद की दुःख पीरा को सदैव बाँचते रहे और बाँचने के साथ ही उन चरित्रों को कटघरे में खड़ा करते रहे हैं
जिनकी सबसे जिम्मेदारी शपथ ग्रहण समारोह में उच्चारे गए शब्दों के प्रति ईमानदार रहने की होती है, लेकिन ऐसा प्रायः दिखाई नहीं देता, जो लोकतंत्र के समुचित विकास के खिलाफ है, जाहिर है कि ‘प्रतिपक्ष’ के कवि के रूप में ख्यात “धूमिल”का प्रभाव डाँ. बलदेव में स्पष्ट दिखता है-जिसे हम पुरखे कवियों से संस्कारित और उत्प्रेरित होते हुए कवि के विकास की सहज प्रक्रिया की तरह देख-परख सकते हैं।

डाँ. बलदेव का कवि आत्ममुग्ध कभी नहीं रहा, बल्कि कविताओं में आत्मविश्लेषण और आत्म आलोचना की प्रक्रिया सतत गतिमान दिखती है-जो इस अर्थ में बहुत महत्वपूर्ण हो जाता है कि उनमें ठहराव की जगह सतत प्रवाहमयता का भाव स्थाई रहा है। इस भाव के बूते ही किसी भी कवि की कविता में समयोचित परवर्तन आता है-भाव,भाषा, शिल्प सभी स्तर पर। प्रसंगवश ‘शीशे की दीवार’ कविता यहाँ सहज याद आती है-

“शीशे के दायरे में कैद हम तुम
एक-दूसरे को देखते हैं, छू नहीं पाते
व्यर्थ की हँसी हँसते हैं
मर्म कुछ समझ नहीं पाते
उत्तेजना बीच की ठंड़ी दीवार में
शांत हो जाती है
इसलिए/हथेलियों का गर्म स्पर्श छू नहीं पाते
और न ही/पारदर्शी यह तोड़ ही पाते।”
(पृ.95)

शीशे के दायरे में कैद होना,व्यर्थ हँसी हँसना, मर्म कुछ समझ न पाना और हथेलियों की गर्माहट को भी महसूस न कर पाना समाज और परिवार दोनों में बढ़ती दूरी और आत्मीयता के तागों का टूटना-बिखरना है-जो भौतिकवादी विकास और भावात्मक आँचविहीन होते रिश्तों की अप्रासंगिकता को दर्शाता है। एक समर्थ कवि के लिए और मनुष्य के लिए भी यह जरूरी है कि वह सारे कृत्रित दीवारों को लांघते हुए जीए पूरेपन के साथ। पूरे आब-ओ-रंग के साथ।

समाज में पसरती जड़ता और रिश्ते-नातों के बिखरते सिहरते सूत्र ,जरूरत से ज्यादा औपचारिकताएँ तथाकथित संभ्रान्त वर्ग की अतिशय चमक-दमक भरी जिंदगी उच्च मध्य वर्ग का ऐसा जीवन यथार्थ है जिसके पीछे सिवा आत्मनिर्वासन और भावनात्मक गुमनामी के कुछ दूसरा नहीं होता।60-70 के दशक में उभरा खाया-पिया अधाया वर्ग बेशक स्वयं को श्रेष्ठ समझता रहा, लेकिन कवि बलदेव यह बखूब जान-समझ और परख रहे थे उस अंधेरे को जो चकाचौंध के पीछे पलता-पुसता रहा है और भीतरी सन्नाटा ही उसके जीवन का सच रहा। कवि बलदेव रेखांकित करते हैं कि –

“मैं अपने में ठहरा हुआ जुलूस हूँ
इतने बड़े समारोह में मैं सिर्फ नाम हूँ।

सुरमई उजास में जो सड़कें कहीं
अलस रात्रि के विलास में भटक गया आदमी
कहीं
..तालियाँ और कहकहों के बीच बजता गिटार हूँ
बुझी हुई शाम का जलता हुआ सिगार हूँ
….व्यक्ति की तलाश में मैं स्वयं गुमनाम हूँ
(पृ.97)

स्पष्ट है डाँ. बलदेव अपने समय और समाज के तिक्त अनुभव जगत में पैठ कर मनुष्य की नियति को परखते-बाँचते हुए अपने समय की डायरी लिख रहे थे, अपनी कविता में – जो एक रचनाकार के रूप में बड़ा और जरूरी काम था-जिसे आज हम बांचते हुए तात्कालीन परिस्थितियों का आकलन कर सकते हैं।

साहित्य इतिहास नहीं होता, लेकिन इतिहास में घटे घटनाक्रमों और सामाजिक राजनीतिक व सांस्कृतिक परिस्थितियों ,संघर्षों का प्रमाणिक दस्तावेज हमें तात्कालीन दौर के साहित्य में बखूब मिलता है।डाँ. बलदेव की कविता इस संदर्भ विशेष में हमारे लिए महत्वपूर्ण दस्तावेज की तरह है। प्रसंगवश यहाँ हमें कवि बलदेव की ‘वृक्ष में तब्दील हो गई औरत’ की पंक्तियाँ सहज याद जाती है-

“अभी-अभी तो,मैं अपनी बीवी और बच्चों के साथ
शहर से लगे, इस जंगल में घूम रहा था
कि सहसा ही, बरगद की एक डाली हिली,
और फिर कई पेड़ काँपने लगे
हम उधर ही देख रहे थे, उधर
डगाल में बैठे जटायु की ओर कि सहसा ही
हमारा आस-पास खौफनाक हो गया
मैंने देखा मेरी बीबी नहीं है
अभी-अभी वह जहाँ खड़ी थी,वहाँ एक पेड़ है।
….बच्चा पूछ रहा है माँ कहाँ है?
वृक्ष में तब्दील हो गयी ,औरत के बारे में
मैं क्या कहूँ, कैसे कहूँ, वह कहाँ है?
कहने की जरूरत नहीं कि ‘बरगद’कैसे अपने नीचे किसी को भी पनपने नहीं देता और बरगद प्रजाति के लोग स्वतंत्र भारत में किस कदर फैले और जड़ जमाए आज भी असंख्य जनों का खाद-पानी सोखते हुए अपनी जड़ें पसार रहे हैं।

एक सजग कवि अपने काल खण्ड में खड़ा रहकर पीछे देखता है, वर्तमान को बांचता है और भविष्य का अनुमान भी लगाता है। डाँ. बलदेव का कवि आद्योपांत इन तीनों ही आयामों में हस्तक्षेप करते हुए ताउम्र ‘जन सामान्य के पक्षधर कवि बने रहे हैं और अब भी बने हुए हैं-अपनी कविताओं में धड़कते हुए।
डाँ. बलदेव की कविता में हम जितना डूबते हैं उतनी ही गहराई और व्यापकता हमें मिलती जाती है जाहिर है एक समर्थ कवि की कविताई का ओर-छोर नहीं होता, पाठक जहाँ ,जैसा उससे मिले-भेंटे वैसी ध्वनियाँ वह सुन सकता है। दरअसल सुनने का यह हुनर ही तो किसी कवि को सामान्य जन से अलग बनाता है.”उस आदिवासी लड़की के भीतर की संगीत'” कविता का यह अंश प्रमाण है अपने इस कवि की उदात्त काव्यात्मकता का-

“कार्ड पोस्ट करती, उस आदिवासी लड़की के भीतर
का संगीत
शायद, जाग उठा है, और ठिठककर वह
लाल डिब्बे के पास ही, रुक गयी है

हल्के बैंगनी रंग की अमेरिकन जार्जेट की साड़ी में
लिपटी वह लड़की और वह लाल डिब्बा
काले रंग के बीच लाल लाल
लाल डिब्बा और वह काली लड़की कैसी मैंचिंग है
वाकई , माडर्न पेन्टिंग है
इसे, इसके भीतर के संगीत को, आदिम संगीत को
फ्लेशगन से शाँट कर सकते हो?(पृ.101)

जाहिर है डाँ. बलदेव चाक्षुष इंद्रियों और जीवन के रंध्रों से जुड़-मिल कर अपनी कविता के फलक का विस्तार करते हैं-जिससे उनकी कविता चित्रात्मक होते हुए पाठक के मन-मस्तिष्क में पैठ जाती है।
इसी क्रम में ‘घोटुल’कविता को बाँच सकते हैं-

“फूल पत्तियों का रस पीकर
हम चिड़ियाओं में तब्दील हुए
रंगों-गंधों ध्वनियों में परिवर्तित
हम असीम नभ नील हुए। (पृ.103)

बेशक आज बस्तर और उसका ‘घोटुल’दोनों ही दहक रहा है नक्सली संघर्ष की आँच से,लेकिन कवि-लेखक की चेतना में जो बस्तर हरा है वह यहाँ बलदेव जी की कविता का महत्वपूर्ण आयाम है।इसी कड़ी में ‘कोरबा’कविता भी याद आती है कि कैसे कोरबा क्षेत्र के आदिवासी अपने जंगल अपनी जमीन और अपनी जड़ से उखड़कर ताउम्र बिखराव भरा जीवन जीने के लिए अभिशप्त है। सरकारें सोचती हैं कि उद्योग आदि के लिए लोगों को विस्थापित करके मुआवजा दे देना ही सब कुछ है, लेकिन यह तो वहीं समुदाय जानता है जिससे उसकी जड़ें और जमीन ले ली गई हो उसका क्या कुछ छीना गया है। डाँ. बलदेव ने इस त्रासदी को देखते-बांचते हुए लिखा है अपनी कविता ‘कोरबा’ में कि-

“मौजूदा सरकार ने उन्हें मकान दिए
कांकरीट की ऊँची दीवारें, हवादार खिड़कियाँ
और रंगीन पर्दे दिए/लेकिन इन्हें रास नहीं आया
प्रेमनगर
हमने पूछा क्यों छोड़ दिए प्रेमनगर
एक ने सकुचाते से कहा-
पक्के मकानों में नंग-धडंग जाने को कैसा लगता
था
जंगल के बिना मन कहीं नहीं लगता था
हम जंगल के साथ उगे/जंगल के साथ बढ़े..।
(पृ.104)

यह एक बड़ी त्रासदी है कि आज दुनिया भर में औद्योगीकरण के चलते जनजातीयजन अपनी जड़ से
उखाड़ फेंक दिये जा रहे-चाहे सरकार किसी की भी हो!विकास के नाम पर किसी जड़ जमाए पौधों का
उखड़ना हो या मनुष्य समुदाय का, वह स्वयं को जिंदा बनाए रखने और जीवन के सहज लय और गति को लौटा लाने में प्रायः सफल होना कठिन होता है, जिसे हम डाँ. बलदेव की कविताओं में बेहतर महसूस कर सकते हैं।

‘खिलना भूलकर’ डाँ. बलदेव की तीसरी काव्य कृति है, जिसकी चुनी हुई कविताएं पढ़ना कवि के विकास और उसके सरोकार से गहरे जुड़ना है।अब तक की उनकी जिन कविताओं से जुड़ते हुए यहाँ पहुचे हैं उससे यह स्पष्ट होता है कि डाँ. बलदेव हिंदी कविता के ऐसे संघर्षधर्मी और प्रतिबद्ध कवि हैं जो कविता सिरजने और अपने व्यक्तित्व के निर्माण में कोई फाँक नहीं छोड़ते। कविता डाँ. बलदेव के लिए अपने समय,समाज और मनुष्य जाति के जीवन सरोकारों से गलबहियाँ करते जीवन पथ पर आगे बढ़ना है।यहाँ ‘ऋण’ कविता याद आ रही है, पूरी कविता है-

“एक भेदिया रात दिन/पीछा कर रही है
लगातार/न जाने दे रहा है।न मरने दे रहा है
और मैं माथे पर/कन्धे पर/पीछे पर
इसकी लदी हुई छिपकली छाया से
भागना चाहता हूँ
और वह लगातार पीछा कर रहा है।”(पृ.111)

‘ऋण’ अर्थात कर्ज को केंद्र में रखकर सिरजी यह कविता संपूर्णता के साथ कर्जदार व्यक्ति की अन्तर्वेदना को व्यंजित करती है।डाँ. बलदेव का कवि गहन संवेदनशीलता के साथ समाज की उन दु:स्थितियों-परिस्थितियों को गहरे पहचानता रहा है, जिससे आज का जन समुदाय भी पीड़ित है। बदली परिस्थितियों में यह कविता आज और भी प्रासंगिक है। कर्ज के भार से किसान-मजदूरों की आत्महत्या का बढ़ता ग्राफ आज के विकट यथार्थ को दर्शाता है।जाहिर है कि एक बड़ा कवि बड़े फलक को संवेदना के दायरे में समेटते हुए समाज के लिए यथार्थ को सामने रखते अपने समय की एक बड़ी आबादी की नियति को उद्घाटित करते विचार का सूत्र पाठक समुदाय को देता है कि कैसे इस दुःस्थिति से स्वयं को बचाए रखना चाहिए।

‘युध्द’ दुनिया के किसी भी राष्ट्र के लिए ,मानव समाज के लिए भयावह और अवांछित होता है, लेकिन दुनिया में चंद ऐसे शासक, ऐसी शक्तियाँ हमेशा होती है जिन्हें युद्ध पसंद होता है और यह चंद लोग निज स्वार्थ के लिए समूची मनुष्य जाति को खतरे में डालकर जीत का ख्वाब पालने को ही जीवन लक्ष्य बना बम-बारूद और बंदूक को ‘जीवन हार’ बना लेते हैं।कवि बलदेव ऐसे युद्ध के पीछे के यर्थाथ को बखूबी बांचते हुए रेखांकित करते हैं कि-

“युद्ध गंध अब कुछ नहीं/सिवाय बकवास के
कुर्सियों के लिए, व्यक्तिगत स्वार्थ के लिए
होते हैं युद्ध, देश के लिए नहीं
हिंसक-जंतुओं से अधखायी शव-पास ही
छोटी बच्ची मुँह में अंगुली रख चीखती है
माँ की सिंदूर ले दिशाएं रंग गयी है
रक्तस्नात इतिहास नंगा खड़ा है।(युद्ध/पृ.116)

जाहिर है डाँ. बलदेव मरण के विरुद्ध जीवन स्वर के कवि थे और युद्ध की बजाय शांति व प्रेम जीवन का सार तत्व है यह बखूबी जानते थे। डाँ. बलदेव का कवि जीवन राग का कवि है यह स्पष्ट है।उनका यह जीवन राग ही उन्हें बच्चों के प्रति स्नेहिल भाव से भरी कविता सिरजवाता है जिसका बड़ा उदाहरण है यह पंक्तियाँ, जिसमें बच्चों से मुखातिब होते प्रकट करते है अपना भावोद्गार –

“अपने कंधे पर बैठा/सैर परी देश की कराऊंगा
पल में नया सूट पहनाऊँगा/तुम्हारी मुठ्ठी में पैसा
भर जाऊंगा
फूलों का गुच्छा /सिरहाने रख जाऊंगा…।

यों इस कविता के अगले पद बंध में डाँ. बलदेव का स्वर बदलता है और भावुकता की भीत से सीधे यथार्थ की सख्त चट्टान से जोड़ते हैं यह कहते हुए कि-

“लेकिन सोचो/सपने भी कहीं सच होंगे
सोचो नींद टूटेगी/और मैं पकड़ नहीं आऊंगा
स्मृतियों में लहराऊंगा /झूठा ही कहलाऊंगा
इसलिए भूखे रहकर भी/सोने की आदत डालो
दुनिया बहुत बड़ी है/जहाँ से मेरी यात्रा खत्म हुई
वहीं से तुम्हें शुरू करना है।'(बच्चों से /पृ.117)

जिंदगी कभी थमती नहीं।जीवन अनवरत यात्रा है, जिसमें चलते हुए आने वाली अड़चनें,कठिनाईयाँ, विसंगतियाँ खोह-खाई के सिवा कुछ और नहीं होती, ना ही किसी अपनों के देह त्याग कर जाना यात्रा पथ का विराम होता है। जीवन समत चलने की प्रक्रिया है-तमाम संकटों को पार करते हुए। डाँ. बलदेव की ऐसी कविताएं हमें संस्कारित करती हैं।हमारे पाँवों को अडिगता और निरन्तरता का बोध कराती हैं-जिससे स्वतः स्पष्ट होता है कि डाँ. बलदेव जीवन नैरंतर्य के बड़े कवि हैं और सदैव रहेंगे।जीवन नैरंतर्य का कवि ही ऐसी ‘कामना’कर सकता है-

“इसके पूर्व कि लोहा ठंडा हो
हथौड़े की चोट से
समय की चाक पर चढ़ा दो
इसके पूर्व कि सूर्य ठंडा हो
पृथ्वी की कोख से/हजारों सूर्य पैदा हो।”
(कामना/पृ.137)

समग्रतया कह सकते हैं कि डाँ. बलदेव की कविताओं का होना हमारे लिए जीवन राग और आस्था के ध्वजवाहक कवि की जीवंत उपस्थिति को गहरे महसूस करना है, जैसा कि उन्होंने अपनी कविता में कहा है-

“मेरा होना/सूरज का उगना है
न होना/याने डूब जाना है
मेरा आना/अपनों को याद करना है
मेरा जाना/सबको भूल जाना है।”

तो हम इस स्वर में अपना स्वर मिलाते हुए कह सकते हैं कि -डाँ. बलदेव का होना हमारी कविता की दुनिया का धड़कना है। जीवन का उमगना है।

• काव्य संग्रह-
• वृक्ष में तब्दील हो गयी औरत
• लेखक : डॉ. बलदेव
• प्रकाशक-
• शैवाल प्रकाशन, गोरखपुर, उत्तरप्रदेश
• मूल्य : 140 रु.

०००

• संपर्क-
• रजत कृष्ण
[ बागबाहरा, जिला- महासमुंद, छत्तीसगढ़. मो. नं. 97553 92532/89592 71277 ]

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रवींद्र-नज़रूल उत्सव-2026 : ‘बंगीय साहित्य संस्था’ के तत्वावधान में रवींद्र-नज़रूल उत्सव 25 जुलाई को ‘ऑफिसर्स एसोसिएशन प्रगति भवन’ में प्रात:11.00 बजे से रात 8.00 बजे तक

काव्य संध्या : प्रगतिशील कवि डॉ. प्रेमकुमार पाण्डेय के निवास में दिव्या सक्सेना, विजया भारती, गजेंद्र द्विवेदी ‘गिरीश’, पारुल पांडेय, संजय मैथिल, युसूफ सागर, हाजी रियाज़ खान गौहर, मनमोहन मतवाला, ओम पांडेय, डॉ. नौशाद अहमद सिद्दीकी ‘सब्र’, छ्गनलाल सोनी, संतराम वर्मा और डॉ. आरबी कुशवाहा शामिल हुए
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काव्य संध्या : प्रगतिशील कवि डॉ. प्रेमकुमार पाण्डेय के निवास में दिव्या सक्सेना, विजया भारती, गजेंद्र द्विवेदी ‘गिरीश’, पारुल पांडेय, संजय मैथिल, युसूफ सागर, हाजी रियाज़ खान गौहर, मनमोहन मतवाला, ओम पांडेय, डॉ. नौशाद अहमद सिद्दीकी ‘सब्र’, छ्गनलाल सोनी, संतराम वर्मा और डॉ. आरबी कुशवाहा शामिल हुए

विशेष : भाईदूज, भाई-बहन के परस्पर प्रेम और दायित्व का त्योहार : भाईदूज और रक्षा बंधन की सनातनी मान्यताएं – श्रीमती संजीव ठाकुर
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विशेष : भाईदूज, भाई-बहन के परस्पर प्रेम और दायित्व का त्योहार : भाईदूज और रक्षा बंधन की सनातनी मान्यताएं – श्रीमती संजीव ठाकुर

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तीन लघुकथा : रश्मि अमितेष पुरोहित

व्यंग्य : देश की बदनामी चालू आहे ❗ – राजेंद्र शर्मा
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व्यंग्य : देश की बदनामी चालू आहे ❗ – राजेंद्र शर्मा

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लघुकथा : डॉ. प्रेमकुमार पाण्डेय [केंद्रीय विद्यालय वेंकटगिरि, आंध्रप्रदेश]

जोशीमठ की त्रासदी : राजेंद्र शर्मा
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जोशीमठ की त्रासदी : राजेंद्र शर्मा

18 दिसंबर को जयंती के अवसर पर गुरू घासीदास और सतनाम परम्परा
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18 दिसंबर को जयंती के अवसर पर गुरू घासीदास और सतनाम परम्परा

जयंती : सतनाम पंथ के संस्थापक संत शिरोमणि बाबा गुरु घासीदास जी
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जयंती : सतनाम पंथ के संस्थापक संत शिरोमणि बाबा गुरु घासीदास जी

व्यंग्य : नो हार, ओन्ली जीत ❗ – राजेंद्र शर्मा
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व्यंग्य : नो हार, ओन्ली जीत ❗ – राजेंद्र शर्मा

🟥 अब तेरा क्या होगा रे बुलडोजर ❗ – व्यंग्य : राजेंद्र शर्मा.
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🟥 अब तेरा क्या होगा रे बुलडोजर ❗ – व्यंग्य : राजेंद्र शर्मा.

🟥 प्ररंपरा या कुटेव  ❓ – व्यंग्य : राजेंद्र शर्मा
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🟥 प्ररंपरा या कुटेव ❓ – व्यंग्य : राजेंद्र शर्मा

▪️ न्यायपालिका के अपशकुनी के साथी : वैसे ही चलना दूभर था अंधियारे में…इनने और घुमाव ला दिया गलियारे में – आलेख बादल सरोज.
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▪️ न्यायपालिका के अपशकुनी के साथी : वैसे ही चलना दूभर था अंधियारे में…इनने और घुमाव ला दिया गलियारे में – आलेख बादल सरोज.

▪️ मशहूर शायर गीतकार साहिर लुधियानवी : ‘ जंग तो ख़ुद ही एक मसअला है, जंग क्या मसअलों का हल देगी ‘ : वो सुबह कभी तो आएगी – गणेश कछवाहा.
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▪️ मशहूर शायर गीतकार साहिर लुधियानवी : ‘ जंग तो ख़ुद ही एक मसअला है, जंग क्या मसअलों का हल देगी ‘ : वो सुबह कभी तो आएगी – गणेश कछवाहा.

▪️ व्यंग्य : दीवाली के कूंचे से यूँ लक्ष्मी जी निकलीं ❗ – राजेंद्र शर्मा
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▪️ व्यंग्य : दीवाली के कूंचे से यूँ लक्ष्मी जी निकलीं ❗ – राजेंद्र शर्मा

25 सितंबर पितृ मोक्ष अमावस्या के उपलक्ष्य में… पितृ श्राद्ध – श्राद्ध का प्रतीक
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25 सितंबर पितृ मोक्ष अमावस्या के उपलक्ष्य में… पितृ श्राद्ध – श्राद्ध का प्रतीक

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🟢 आजादी के अमृत महोत्सव पर विशेष : डॉ. अशोक आकाश.

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🟣 अमृत महोत्सव पर विशेष : डॉ. बलदाऊ राम साहू [दुर्ग]

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🟣 समसामयिक चिंतन : डॉ. अरविंद प्रेमचंद जैन [भोपाल].

राजनीति न्यूज़

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मुख्यमंत्री भूपेश बघेल ने उदयपुर हत्याकांड को लेकर दिया बड़ा बयान

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■छत्तीसगढ़ :

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भारतीय जनता पार्टी,भिलाई-दुर्ग के वरिष्ठ कार्यकर्ता संजय जे.दानी,लल्लन मिश्रा, सुरेखा खटी,अमरजीत सिंह ‘चहल’,विजय शुक्ला, कुमुद द्विवेदी महेंद्र यादव,सूरज शर्मा,प्रभा साहू,संजय खर्चे,किशोर बहाड़े, प्रदीप बोबडे,पुरषोत्तम चौकसे,राहुल भोसले,रितेश सिंह,रश्मि अगतकर, सोनाली,भारती उइके,प्रीति अग्रवाल,सीमा कन्नौजे,तृप्ति कन्नौजे,महेश सिंह, राकेश शुक्ला, अशोक स्वाईन ओर नागेश्वर राव ‘बाबू’ ने सयुंक्त बयान में भिलाई के विधायक देवेन्द्र यादव से जवाब-तलब किया.

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भिलाई कांड, न्यायाधीश अवकाश पर, जाने कब होगी सुनवाई

धमतरी आसपास
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स्मृति शेष- बाबू जी, मोतीलाल वोरा

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छत्तीसगढ़ कांग्रेस में हलचल

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राज्यसभा सांसद सुश्री सरोज पाण्डेय ने छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री भूपेश बघेल से कहा- मर्यादित भाषा में रखें अपनी बात

मुख्यमंत्री श्री भूपेश बघेल  ने डाॅ. नरेन्द्र देव वर्मा पर केन्द्रित ‘ग्रामोदय’ पत्रिका और ‘बहुमत’ पत्रिका के 101वें अंक का किया विमोचन
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मुख्यमंत्री श्री भूपेश बघेल ने डाॅ. नरेन्द्र देव वर्मा पर केन्द्रित ‘ग्रामोदय’ पत्रिका और ‘बहुमत’ पत्रिका के 101वें अंक का किया विमोचन

मरवाही उपचुनाव
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प्रमोद सिंह राजपूत कुम्हारी ब्लॉक के अध्यक्ष बने

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ओवैसी की पार्टी ने बदला सीमांचल का समीकरण! 11 सीटों पर NDA आगे

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छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री भूपेश बघेल, ग्वालियर में प्रेस वार्ता

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अमित और ऋचा जोगी का नामांकन खारिज होने पर बोले मंतूराम पवार- ‘जैसी करनी वैसी भरनी’

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छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री, भूपेश बघेल बिहार चुनाव के स्टार प्रचारक बिहार में कांग्रेस 70 सीटों में चुनाव लड़ रही है

सियासत- हाथरस सामूहिक दुष्कर्म
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सियासत- हाथरस सामूहिक दुष्कर्म

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हाथरस गैंगरेप के घटना पर मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने क्या कहा, पढ़िए पूरी खबर

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पत्रकारों के साथ मारपीट की घटना के बाद, पीसीसी चीफ ने जांच समिति का किया गठन