कवि और कविता : पल्लव चटर्जी

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• कष्ट

इंसान बुद्धिजीवी है
कष्टों को –
कविता के ज़रिए
बयान करता है
ज़ुबान से कहे तो कई लोग
सुनना नहीं चाहते
खुश भी नहीं होते।
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• नदी का नाम गंगा और पद्मा

सोचकर ही हैरान हो जाता हूँ
नदी के इस पार जो गंगा है
उस पार वही पद्मा नदी
नाम से बह रही है।
सवाल उठ ही सकता है!
अरे भाई! नाम से क्या फर्क पड़ता है
उसने भी तो मान लिया है।
सदीयों से अमृत धारा बहाती चली आ रही है।
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• सच्ची बात

साँस टूट जाने तक
जो लोग सच्ची बात नहीं कह पाते
दिल में शिकायत लिए चुपचाप
दुनिया छोड़ जाते हैं –
किस वजह से?
हताशा घेर लेते हैं उन्हें
क्या उन्हें लफ़्ज़ नहीं मिलते?
या फिर डर जाते हैं।
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• पहाड़ी झरना

तुम्हें देखते ही
एक पहाड़ी झरना
मन के भीतर
बहने लगता है
लगता है
सबकुछ ठीक है ।
इतना तो
तुमसे कह ही सकता हूँ।
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• अकेला

सभ्यता की प्रगति के बीच
इंसान अब भी अंधेरे में डूबा है,
रोशनी की ओर बढ़ने की
न कोई इच्छा है न ही कोशिश ,
उनके पास कुछ भी नहीं है।
यही लोग आखिर में एक दिन
अकेले पड़ जाते हैं।
[ • बांग्ला-हिंदी के प्रगतिवादी कवि पल्लव चटर्जी, प्रगतिशील जन-विचारधारा की साहित्यिक संस्था ‘आरंभ’ के संस्थापक सदस्य एवं समिति के आतंरिक अंकेक्षक हैं.]
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chhattisgarhaaspaas
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