‘आरंभ’ साहित्यिक मंच : दीप्ति श्रीवास्तव
• बहना

ये खून का रिश्ता है “बहना”
तोड़ने से भी न टूटेगा
गलत फहमियां को
झिर से भी आने न देना रिश्ते को असली मजबूती देना
लोग झिर बनाने में
सारी उम्र गुजार देते
और हम है कि
झिर को भर भरकर
नफरत को जला देते
जिन रिश्तों में
मन की दूरियां बस जाती
वहीं रिश्तेदारियां बिखर जाती
हम तो प्लाज्मा है
खून का तुम्हारे
खून में हम ही बहते
हर धड़कन के साथ रहते
हंसी ठिठोली
बहनों बीच
होती कोई न ऊंच नीच
बहुत कुछ कहा सुना
हमारे कानों ने
फिर भी वफा निभाई
झिर में पैबंद लगा
हर दरार को भरा
खून के रिश्ते की लाज निभाई
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• दर्द

मरीज क्लीनिक आया,
डॉक्टर को दिखाया।
मर्ज अपना बतलाया
“डॉक्टर साहब,
दिमाग में दर्द है!”
डॉक्टर थोड़ा घबराया,
मेडिकल साइंस भी चकराया
फिर मरीज बोला
“मतलब… दिमाग है दुखता !”
डॉक्टर ने माथा पकड़ लिया,
अपना ही दिमाग जकड़ लिया
सोचा
“इतनी पढ़ाई किस काम आई,
ये कैसी नई बीमारी भाई!”
उधेड़बुन में डॉक्टर के दिमाग में होने लगा दर्द
मरीज पूछा
“क्या हुआ डॉक्टर साहब?”
डॉक्टर बोला
“अब मेरे दिमाग में है दर्द …”
मरीज हँसकर बोला
“वाह डॉक्टर साहब!
बिना फीस ही
दर्द ट्रांसफर हो गया!”
इतना कहकर उठ गया झट,
न फीस दी, न छोड़ा नोट
डॉक्टर पीछे सोचता रह गया
“ये मरीज था
या चलता-फिरता डेटा ट्रांसफर ऐप!”
क्लीनिक में अब चर्चा भारी
“दर्द नहीं था साधारण ,
ये तो था
वाई-फाई वाला दर्द,
जो एक दिमाग से
दूसरे में हो गया फॉरवर्ड!”
[ • सुस्थापित लेखिका- कवयित्री दीप्ति श्रीवास्तव प्रगतिशील जन-विचारधारा की साहित्यिक संस्था ‘आरंभ’ की उपाध्यक्षा हैं. ]
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chhattisgarhaaspaas
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