इस माह की कवयित्री : शुचि ‘भवि’

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• कवयित्री शुचि ‘भवि’
• सुप्रसिद्ध साहित्यकार स्व. डॉ. त्रिलोकीनाथ क्षत्रिय की सुपुत्री शुचि ‘भवि’ एमएससी [इलेक्ट्रॉनिक्स गोल्ड मेडलिस्ट] एम.ए. [हिंदी, समाजशास्त्र] बी.एड. की डिग्री प्राप्त, 24 नवम्बर को जन्मीं शुचि ‘भवि’ एक निजी स्कूल में अध्यापन का कार्य कर रही हैं. • अनेकों सम्मान से सम्मानित शुचि ‘भवि’ की अब-तक प्रकाशित कृतियाँ- ‘मेरे मन का गीत’/’बाँहों में आकाश’/’सबसे अच्छा काल’/’ख्वाबों की खुशबू’/’आर्यकुलम की नींव’/’मसाफ़त-ए- ख़्वाहिशात’/’सबमें है जगदीश’/’ज़र्द पत्ते और हवा’/’हेतवी'[उपन्यास]/’छंद फुलवारी’ [छंद संग्रह छत्तीसगढ़ भाषा में]/ • अन्य प्रकाशन- दोहा एकादशी/दोहा दुनिया/दोहा मंथन/’विविध प्रसंग’/’101 महिला ग़ज़लकार’/’इक्कीसवीं सदी के इक्कीसवें साल’ की बेहतरीन ग़ज़लें/’कथाजलि व बूंद-बूंद में सागर'[लघुकथा संग्रह]/ ‘शेषामृत'[गीत संग्रह]/’श्रेष्ठ बालमन की कहानियां’ एवं अन्य साझा संकलन. • ‘चश्म-ए-उर्दू’/’हरिगंधा’/’अदबी दहलीज़’/’अर्बाबे कलम’/’साहित्य सारांश’/’गीत सागर’/’छत्तीसगढ़ मित्र’/’छत्तीसगढ़ आसपास’/’नारी का संबल’/’काव्यांजलि’ पत्रिकाओं सहित अनेक समाचार पत्रों एवं ई- पत्रिकाओं में नियमित प्रकाशन. • अनेकों सम्मान से सम्मानित, दूरदर्शन एवं आकाशवाणी रायपुर से रचनाओं का समय-समय पर प्रसारण.
* पता : बी-512, सड़क-4, स्मृति नगर, भिलाई नगर-490020, जिला-दुर्ग [छत्तीसगढ़]
* संपर्क- 9826803394
* ई-मेल-
*shuchileekha@gmail.com
– संपादक
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• मृत्यु

मृत्यु है सच अंतिम
या फिर है कर्म ??
सोचते हैं हम हरदम
और तुम भी तो …
फिर क्यूँ शमशान शोक
न रहता हरदम ??
चिता एक जलती जब
कह जाती हमसे तब
अंत ये नहीं है,जान लो
है शुरुआत,अब हिसाब की ….
जो कमाया इतने वर्षों
उन्हें देखने की बात की ….
स्वतंत्र थे जब कर्म करने
उत्तम कर्म कम किए
माटी थे माटी ही मिले
पर कर्मों की बरसात थी ….
सदकर्म भी साथ चले
और बुरे भी संग ….
मृत्यु है सच अंतिम
या फिर है कर्म ??
सोचते हैं हम …
हरदम ………..
और
तुम भी तो शायद ….??
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• नामुमकिन

सुनो
चलोगे मेरे साथ
उस माँ से मिलने
जीवन को जो जीना जानती है
तो क्या हुआ
बच्चों को बड़ा कर बड़ा बनाते तक
झुकते झुकते कुछ इतना झुकीं वो
कि अब कड़छुल तक पहुँचने के लिए भी
उठना होता है उन्हें थोड़ा सा,,,
मिलोगे क्या तुम भी
उस माँ से
जिसने बच्चों के मन में ख़्वाब भरे थे कभी
ऊँचा उड़ने के
और उनकी आँखों की गहराई में डूब कर
पूरे भी किए थे वो सारे स्वप्न
क्या हुआ कि उन सपनों में
अपनी मोतियाबिंद वाली आँखों की जगह ही न बचाई,,,,
बोलो भी
मिलोगे क्या उस नारी से
जिसने सीखा स्मार्ट फ़ोन पर
बस उतना ही स्मार्ट बनना
जितने में विदेश में पैदा हुए
पोते-पोती,नाती-,नतिनी का बचपन
वो जी सके घर बैठे
अपने बुढ़ापे के साथ,,,,
सुनो
उस अम्मा ने मुझे कहा था पिछली बार
कि
मैं ज़िंदा हूँ
यह प्रमाण घर आकर ले जाया करो
पेंशन के पैसे
औलाद की तरह ही हैं न
जिनके बिना जीना नामुमकिन है ,,,,
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• युद्ध

युद्ध
शान्ति के लिए
कभी न हुआ है
न हो सकता है,,,
युद्ध होता है
सिर्फ़ और सिर्फ़
युद्ध के लिए ,,,
शान्ति सीखनी है तो
फूलते फलते वृक्ष से सीखे मानव
जो काटने वालों पर भी
अपने पुष्पों की वर्षा करता है
पत्थर मारने वालों को भी
रसीले फल देता है
काश!
शान्ति के लिए
युद्ध न होते कभी ,,,,,,
[ • कवयित्री शुचि ‘भवि’ की हिंदी कविता प्रगतिशील परंपरा से समकालीन कविता को जोड़ती है. इनकी कविताएं साहित्य में अपनी एक जगह तलाशते हुए पहचान बना चुकी हैं.- संपादक ]
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chhattisgarhaaspaas
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