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रवींद्र सुधा का आयोजन : गुरुदेव रवींद्रनाथ ठाकुर की अमर स्मृति में 22वां ‘श्रावण-धरती से अनंत के पार’ [On Earth and Beyond] सांस्कृतिक स्मरण-संध्या श्रद्धा

👉 • रवींद्र सुधा एवं भिलाई इस्पात संयंत्र ऑफ़िसर्स एसोसिएशन के सहयोग से 13 अगस्त को गुरुदेव रवींद्रनाथ ठाकुर की पुण्य तिथि पर भाव-विभोर वातावरण में सम्पन्न हुआ

👉 • इस विशेष संध्या में गुरुदेव के जीवन, दर्शन, साहित्य, संगीत और उनकी विराट मानवीय चेतना को गीत, संगीत, नृत्य, आलेख एवं भाव-अभिव्यक्ति के माध्यम से स्मरण किया गया
• छत्तीसगढ़ आसपास
• भिलाई
श्रावण की भीगी संध्या, गरजते मेघ, वर्षा की रिमझिम बूंदें, गीतों की मधुर स्वर-लहरियाँ और गुरुदेव रवीन्द्रनाथ ठाकुर की अमर स्मृति, इन सबके अद्भुत संगम के बीच गुरुदेव की पुण्यतिथि पर आयोजित “22वाँ श्रावण-धरती से अनंत के पार (On Earth and Beyond)” सांस्कृतिक स्मरण-संध्या श्रद्धा, संवेदना और भाव-विभोर वातावरण में संपन्न हुई।

रवींद्र सुधा द्वारा ऑफ़िसर्स एसोसिएशन भिलाई इस्पात संयंत्र के सहयोग से गुरुवार, 13 अगस्त को प्रगति भवन, सिविक सेंटर, भिलाई में आयोजित इस विशेष संध्या में गुरुदेव के जीवन, दर्शन, साहित्य, संगीत और उनकी विराट मानवीय चेतना को गीत, संगीत, नृत्य, आलेख एवं भाव-अभिव्यक्ति के माध्यम से स्मरण किया गया।
कार्यक्रम की मूल परिकल्पना संगीत गुरु श्री बिश्वजीत सरकार, श्रीमती संचयिता राय एवं श्रीमती मौऊ राय द्वारा की गई थी। उनकी संवेदनशील और कलात्मक कल्पना ने गुरुदेव के महाप्रयाण को केवल मृत्यु की घटना न मानकर धरती से अनंत की ओर एक काव्यमय एवं आध्यात्मिक यात्रा के रूप में मंच पर साकार किया। इस संकल्पना में धरती और परलोक, जीवन और मृत्यु, स्मृति और अनंत के बीच एक भावपूर्ण संवाद को अत्यंत प्रभावशाली ढंग से प्रस्तुत किया गया।
कार्यक्रम की मुख्य अतिथि श्रीमती केका सरकार, धर्मपत्नी श्री प्रबीर कुमार सरकार, ई.डी. (प्रोजेक्ट), बी.एस.पी., भिलाई थीं। विशिष्ट अतिथियों के रूप में श्री अनिर्बान दासगुप्ता, भूतपूर्व डायरेक्टर-इन-चार्ज, बी.एस.पी., भिलाई; श्रीमती त्रिपर्णा दासगुप्ता, श्री परमिंदर सिंह, भूतपूर्व सचिव, ऑफिसर्स एसोसिएशन तथा “जगते आनंदयज्ञे” संस्था के मुख्य कर्णधार श्री समीर रक्षित, राजदीप सेन, चिरंजीवी जैन, श्रीति दत्ता, शक्तिपद चक्रवर्ती, शांतनु दासगुप्ता सहित अनेक गणमान्य अतिथि उपस्थित रहे।
संध्या का वातावरण उस समय और अधिक भावमय हो उठा, जब मंच पर गुरुदेव की जीवन-यात्रा और उनके महाप्रयाण को स्मरण करते हुए यह अनुभूति कराई गई कि मृत्यु किसी यात्रा का अंत नहीं, बल्कि अनंत के द्वार पर एक नए मिलन की शुरुआत है। धरती पर जहाँ विरह और विदाई की अनुभूति थी, वहीं कल्पना के पार एक ऐसे लोक का सृजन हुआ, जहाँ गुरुदेव का स्वागत शोक से नहीं, बल्कि गीत, संगीत और उत्सव की उजली आभा से होता है।
प्रस्तुति के दौरान श्रीमती मौऊ राय द्वारा प्रस्तुत भावपूर्ण वर्णना एवं संवाद ने पूरे वातावरण को अत्यंत संवेदनशील बना दिया। ऐसा लगा मानो श्रावण के मेघ स्वयं गुरुदेव की कविताएँ गा रहे हों, वर्षा की बूंदें उनके गीतों की ताल पर झूम रही हों और वृक्षों की सरसराहट शांतिनिकेतन की उस आत्मीय स्मृति को पुनर्जीवित कर रही हो, जहाँ प्रकृति, मनुष्य और कला एक-दूसरे से अभिन्न हैं।
नृत्य प्रस्तुतियां ने बाँधा समां


कार्यक्रम में नृत्य गुरु एवं Tehai Dance Academy की निदेशक श्रीमती अमृता सान्याल के कुशल नृत्य निर्देशन में बच्चों द्वारा प्रस्तुत मनोहारी नृत्य ने दर्शकों को मंत्रमुग्ध कर दिया। इसके अलावा अन्य नृत्यांगनायों श्रीजा एवं मेधा के भावपूर्ण एवं सहज अभिव्यक्ति ने अपनी भाव-भंगिमाओं, लय, ताल, सधे हुए कदमों और नृत्य-सौंदर्य के माध्यम से गुरुदेव की कला-संवेदना एवं सांस्कृतिक चेतना की सुंदर झलक प्रस्तुत की।
इन कलाकारों की सधी हुई कदमताल से सजी प्रस्तुति केवल एक नृत्य नहीं, बल्कि धरती से अनंत की ओर जाती स्मृतियों, संवेदनाओं और कला की उस यात्रा का सुंदर स्पंदन थी, जिसने पूरी संध्या को और अधिक गरिमामय और प्रभावशाली बना दिया। बच्चों की सहज अभिव्यक्ति में गुरुदेव के गीतों और दर्शन की अनुभूति ने दर्शकों के हृदय को गहराई से स्पर्श किया।
गुरुदेव की रचनाओं और जीवन-दर्शन से प्रेरित अन्य प्रस्तुतियों ने भी उपस्थित दर्शकों को भाव-विभोर कर दिया। गीतों और नृत्य की प्रस्तुतियों में जहाँ उनकी सृजनशीलता को नमन किया गया, वहीं भाव-अभिव्यक्ति के माध्यम से उनके उस विराट दर्शन को सामने रखा गया, जिसमें जीवन मृत्यु से बड़ा है और प्रेम सभी सीमाओं से परे है।
कार्यक्रम की सफलता में सांस्कृतिक सचिव श्रीमती मौऊ राय सहित संस्था के सभी सदस्यों का महत्वपूर्ण सहयोग रहा। कलाकारों, संगीतज्ञों एवं आयोजन से जुड़े सभी सहयोगियों ने पूरे समर्पण और श्रद्धा के साथ इस सांस्कृतिक स्मरण-संध्या को गरिमा प्रदान की।
इस अवसर पर उपस्थित अतिथियों एवं दर्शकों ने आयोजन की भावपूर्ण परिकल्पना, उत्कृष्ट प्रस्तुतियों और कलाकारों के समर्पण की सराहना की। उन्होंने कहा कि गुरुदेव को स्मरण करने का इससे अधिक आत्मीय माध्यम शायद ही हो सकता है, जिसमें उनके शब्द केवल सुने नहीं जाते, बल्कि अनुभव किए जाते हैं।
रवीन्द्र सुधा के अध्यक्ष श्री राजदीप सेन ने कार्यक्रम की गरिमामयी उपस्थिति एवं दर्शकों द्वारा दिए गए उत्साहपूर्ण प्रोत्साहन के लिए सभी अतिथियों, कलाकारों, सहयोगियों एवं दर्शकों के प्रति हार्दिक आभार व्यक्त किया।
“22वाँ श्रावण-धरती से अनंत के पार” ने अंततः यही संदेश दिया कि गुरुदेव शरीर से भले ही हमारे बीच नहीं हैं, पर उनके गीतों में जीवन है, उनकी कविताओं में प्रकृति है, उनके दर्शन में मानवता है और उनकी सृजन-चेतना में वह अनंत प्रकाश है, जो पीढ़ियों को आलोकित करता रहेगा।
श्रावण की उस पावन संध्या में जब अंतिम स्वर गूँजा, तो ऐसा लगा मानो कोई विदाई नहीं हुई,
एक गीत धरती से उठा और अनंत के पार जाकर फिर से गूँज उठा।

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