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प्रोफ़ेसर सुमित सरकार : बेबाक इतिहासकार, जो बने-बनाये आख्यानों को नकारते थे- रबीकर गुप्ता

8 hours ago
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13 अगस्त, 2026 का दिन इतिहास की देवी ‘क्लियो’ के लिए दुख का दिन था, क्योंकि आधुनिक भारत के महान इतिहासकारों और इतिहास के सबसे बड़े चहेतों में से एक, प्रोफ़ेसर सुमित सरकार ने अपनी आखिरी सांस ली। 87 साल की उम्र में, प्रोफ़ेसर सरकार बीमारी से अपनी लंबी लड़ाई हार गए। उनके परिवार में उनकी पत्नी, मशहूर इतिहासकार तानिका सरकार और उनके बेटे आदित्य सरकार हैं। प्रोफ़ेसर सरकार का जाना सिर्फ़ एक व्यक्ति का जाना नहीं है, बल्कि एक ऐसी संस्था का अचानक ढह जाना है, जिसकी मौजूदगी को हम इतने लंबे समय से सामान्य बात मान रहे थे। उनके निधन के साथ, उन बुद्धिजीवियों की संख्या और कम हो गई है, जो मानते हैं कि बुद्धिजीवियों का काम सिर्फ़ कैरियर को आगे बढ़ाने के लिए ‘आइवरी टावर’ (आम लोगों से दूर ऊंचे ओहदे पर बैठे रहना) में बैठकर शोध पेपर और किताबें लिखना नहीं है।

प्रोफ़ेसर सरकार का जन्म 1939 में कलकत्ता के एक ब्राह्मो परिवार में हुआ था। उनके अकादमिक कामों और अकादमिक दायरे से बाहर की सक्रियता को आगे बढ़ाने वाली सोच यहीं पर बनी और विकसित हुई। उनके पिता, प्रोफ़ेसर सुसोभन चंद्र सरकार, प्रेसिडेंसी कॉलेज में इतिहास पढ़ाते थे। वे मार्क्सवादी ऐतिहासिक विश्लेषण के शुरुआती अग्रदूतों में से एक थे और भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी के लंबे समय से मित्र थे। सुमित सरकार ने भी अपने पिता के रास्ते पर ही चलना चुना। उन्होंने प्रेसिडेंसी कॉलेज से स्नातकोत्तर किया और कलकत्ता विश्वविद्यालय से पीएचडी की डिग्री हासिल की। ​​दिल्ली आने से पहले उन्होंने कुछ समय तक बर्दवान और कलकत्ता विश्वविद्यालय में इतिहास पढ़ाया। प्रोफ़ेसर सरकार ने 1974 में दिल्ली विश्वविद्यालय में इतिहास पढ़ाना शुरू किया और बेहतर मौकों की तलाश में कहीं और जाने के बजाय, उन्होंने इस संस्थान को अपने जीवन के तीन दशक दिए।

प्रोफ़ेसर सरकार उस समय (शायद आज भी) एक क्रांतिकारी तरीके से पढ़ाते थे। उनकी कक्षा का पहला हिस्सा साधारण व्याख्यान जैसा लगता था। वे छात्रों के सामने उस दिन के विषय से जुड़ी एक मानक ऐतिहासिक आख्यान रखते थे, जिसके समर्थन में कई तथ्य होते थे। लेकिन कक्षा के बीच में, जब छात्रों को लगता था कि वे प्रोफ़ेसर की बात समझ गए हैं, तो सरकार अचानक अपना रुख बदल लेते थे। बहुत मेहनत से एक आख्यान बनाने के बाद, वे उसे व्यवस्थित तरीके से तोड़ते और उसका विश्लेषण करते थे। इसके लिए वे उन तथ्यों का इस्तेमाल करते थे, जिन्हें नज़रअंदाज़ कर दिया गया था, उन आवाज़ों को सामने लाते थे, जिन्हें भुला दिया गया था, और उन लेखों का ज़िक्र करते थे, जिनकी नए नज़रिए से व्याख्या की जा सकती थी। जादू की तरह, वह आख्यान खुद-ब-खुद बदल जाता था और कई बार तो वह आख्यान बिल्कुल वैसा नहीं होता था, जैसा कक्षा ने शुरू में सोचा था। इस पूरी प्रक्रिया के ज़रिए, प्रोफ़ेसर सरकार अपने छात्रों को दो महत्वपूर्ण बातें सिखाते थे : अ) कोई भी मान्यता इतनी पक्की नहीं, कोई भी आख्यान इतना अटूट नहीं, और कोई भी घटना इतनी पवित्र नहीं कि उसे नए तथ्यों के आधार पर तोड़ा और नए नज़रिए से समझा न जा सके, और ब) उन्होंने अपने छात्रों के मन में मार्क्स का पसंदीदा सिद्धांत बैठाया — ‘हर चीज़ पर शक करो’।

प्रोफ़ेसर सरकार इतिहास को द्वंद्वात्मक नज़रिए से देखते थे और मानते थे कि यह हमेशा गतिशील रहता है। वे घटनाओं के किसी साफ़-सुथरे और सरल पाठ में कभी विश्वास नहीं करते थे ; बल्कि वे हमेशा उन अनेक और जटिल ऐतिहासिक प्रवृत्तियों और ताक़तों को खोजने की कोशिश करते थे, जो अक्सर साफ़-सुथरे आख्यानों के पीछे छिपी रहती हैं। उनके इस नज़रिए को उनकी पहली किताब में ही देखा जा सकता है, जो उनकी पीएचडी थीसिस भी थी — ‘द स्वदेशी मूवमेंट इन बंगाल, 1903-1908’ (1973 में प्रकाशित)। इस किताब में सुमित सरकार ने एक ऐसे आंदोलन को चुना, जिसके बारे में सब कुछ कहा जा चुका था, और फिर उस साफ़-सुथरे राष्ट्रीय आख्यान को पूरी तरह से चुनौती दी। अख़बार के लेखों, नाटकों, कविताओं और यहाँ तक कि अप्रकाशित संस्मरणों जैसे विभिन्न स्रोतों का इस्तेमाल करके सरकार ने स्वदेशी आंदोलन की नई व्याख्या की। उन्होंने इतिहास को धूल-धूसरित अभिलेखागारों से निकालकर संस्कृति और जन-स्मृतियों के जीवंत दायरे में ला खड़ा किया। इस तरह के स्रोतों का उनका क्रांतिकारी इस्तेमाल अब एक मानक तरीका बन गया है, लेकिन ऐसा इसलिए हुआ, क्योंकि उन्होंने ही इसकी शुरुआत की थी।

उस समय तक राष्ट्रीय आंदोलन की सभी घटनाओं को एक ऐसी पवित्र भूमि माना जाता था, जहाँ कोई इतिहासकार केवल सम्मान के साथ ही कदम रख सकता था। प्रोफ़ेसर सरकार एक ऐसे व्यक्ति थे, जो परंपराओं और स्थापित मान्यताओं को चुनौती देने से नहीं डरते थे। उनकी बेबाक, लेकिन निष्पक्ष जांच-पड़ताल ने स्वदेशी आंदोलन से जुड़े राष्ट्रीय मिथकों की परतें खोल दीं। उन्होंने ‘भद्रलोक’ नेतृत्व की उन कमियों को उजागर किया, जिन पर पहले किसी का ध्यान नहीं गया था और जिनका विश्लेषण नहीं हुआ था — ये नेता हमेशा आंदोलन को अपने नियंत्रण में रखना चाहते थे। इसके साथ ही, उन्होंने आंदोलन से जुड़े हिंदू प्रतीकों और खास सांस्कृतिक ढांचे का भी ज़िक्र किया, जिनका इस्तेमाल अंग्रेजों ने मुस्लिम जनता को आंदोलन से दूर रखने के लिए किया था, और उन उग्र मज़दूर आंदोलनों का भी ज़िक्र किया, जिन्होंने ‘नीचे से दबाव’ बनाया था।

इसके बाद सरकार ने इस किताब में इस्तेमाल किए गए तरीकों को एक बहुत बड़े दायरे में लागू किया — 19वीं सदी के आखिर से लेकर आज़ादी तक के पूरे स्वतंत्रता संग्राम के दौर पर। इसका नतीजा प्रोफ़ेसर सरकार की सबसे मशहूर किताब ‘मॉडर्न इंडिया, 1885-1947’ के तौर पर सामने आया। लाल रंग की यह मोटी किताब, जिसे कई पीढ़ियों के इतिहास के लाखों छात्रों ने पसंद किया, सुमित सरकार के इतिहास को देखने के नज़रिए को सबसे दूर-दराज़ के कॉलेजों तक ले गई। इस किताब का मकसद सिर्फ़ तथ्यों को बताना नहीं था, और लेखक ने शुरू से ही यह बात साफ़ कर दी थी। किताब के हर दूसरे वाक्य में सरकार का विश्लेषण करने का अनोखा अंदाज़ दिखता है, जिसने स्वतंत्रता संग्राम को एक साफ़-सुथरा, एक जैसा और एक ही दिशा में चलने वाला आंदोलन मानने की गलतफहमी को सिलसिलेवार ढंग से तोड़ा और उन अलग-अलग ताकतों और उनके अलग-अलग एजेंडों को सामने लाया, जिन्होंने इस आंदोलन को आगे बढ़ाया। सुमित सरकार के काम में कांग्रेस सिर्फ़ एक पार्टी के तौर पर नहीं, बल्कि एक मंच के तौर पर उभरती है। मज़दूर, किसान और आदिवासी महज़ ‘राष्ट्रीय नेताओं’ के इशारे पर चलने वाली बेबस भीड़ के रूप में नहीं, बल्कि अपनी मर्ज़ी और एजेंडे वाली ताकतों के रूप में सामने आते हैं ; कई मामलों में उन्होंने नीचे से इतना ज़बरदस्त दबाव बनाया कि स्वतंत्रता संग्राम की दिशा ही बदल गई और ‘राष्ट्रीय नेताओं’ को लोगों के साथ कदम मिलाने के लिए भाग-दौड़ करनी पड़ी। ‘लोकप्रिय’ आंदोलन और ‘मध्यम वर्ग’ का नेतृत्व — औपनिवेशिक भारत के आखिरी दौर पर प्रोफ़ेसर सरकार का यह काम उनके सबसे अनोखे कामों में से एक है। वे दिखाते हैं कि कैसे ‘मध्यम वर्ग’ का नेतृत्व हमेशा ‘लोकप्रिय’ आंदोलनों की ऊर्जा को अपने निश्चित लक्ष्य की तरफ़ मोड़ने के लिए बेचैन रहता था, लेकिन साथ ही उससे किसी भी तरह की सामाजिक क्रांति के पैदा होने से बहुत डरता भी था। इन नए विश्लेषणों को सरकार की बहुत सारे विषयों पर ज़बरदस्त पकड़ का सहारा मिला था। उनकी पढ़ाई-लिखाई का दायरा कितना बड़ा था, यह उनके निबंधों के संग्रह ‘राइटिंग सोशल हिस्ट्री’ को पढ़कर समझा जा सकता है, जिसमें उन्होंने भारतीय इतिहास लेखन में ई.पी. थॉम्पसन की अहमियत से लेकर विद्यासागर की बौद्धिक और सामाजिक दुनिया जैसे अलग-अलग विषयों पर बात की है।

प्रोफ़ेसर सरकार की एक बड़ी खूबी यह थी कि वे अपने ही काम का विश्लेषण भी उसी बेबाक, शक करने वाले और लीक से हटकर सोचने वाले नज़रिए से करते थे। उनके मुताबिक, इतिहास में कोई भी बात आखिरी नहीं होती। समय के साथ इतिहास से जुड़े सवाल बदलते रहते हैं और उनके साथ इतिहास का विश्लेषण भी। अपने कैरियर के आखिर में, जब ज़्यादातर अकादमिक अपनी पुरानी कामयाबियों के सहारे आराम करते हैं, सुमित सरकार ने पीछे मुड़कर देखा, तो पाया कि उनकी सबसे असरदार किताब, ‘मॉडर्न इंडिया, 1885-1947’, काफी पुरानी हो चुकी थी और अब आज के सवालों के जवाब नहीं दे सकती थी। इसका हल उन्होंने यह निकाला कि किताब को शुरू से आखिर तक पूरी तरह से दोबारा लिखा जाए। इसके बाद जो किताब तैयार हुई, ‘मॉडर्न टाइम्स : इंडिया 1880-1950’, उसमें लिंग, पर्यावरण और सिनेमा जैसे अलग-अलग विषयों को शामिल किया गया और उन पर बात की गई। इससे किताब का पूरा ढांचा ही बदल गया। किसी इतिहासकार द्वारा अपनी ही किताब में इतने बड़े पैमाने पर बदलाव के बहुत कम उदाहरण मिलते हैं। अपने ही काम को लेकर इसी लगातार शक करने की आदत की वजह से उन्होंने 1980 के दशक के आखिर में ‘सबॉल्टर्न ग्रुप’ की दिशा पर सवाल उठाए थे ; यह वही ग्रुप था, जिसके साथ उन्होंने काफी समय बिताया था और जिसमें अहम योगदान दिया था।

प्रोफ़ेसर सरकार का मानना ​​था कि उनकी ज़िम्मेदारी सिर्फ़ ‘नीचे से दबाव’ का विश्लेषण करने और उन दबे-कुचले वर्गों के बारे में लिखने तक सीमित नहीं थी, जिनकी आवाज़ को ताकतवर लोगों ने दबा दिया था। उनके विचारों ने उन्हें बार-बार अकादमिक दुनिया के ऊँचे और अलग-थलग दायरे से बाहर निकलकर आम लोगों के बीच आने के लिए प्रेरित किया। प्रोफ़ेसर सरकार लोगों को पवित्र, कभी गलती न करने वाला या हमेशा सही मानने वालों में से नहीं थे। लेकिन उनका मानना ​​था कि लोगों के साथ खड़े रहना हमेशा उनका फ़र्ज़ है। इस मामले में वे पुराने रूसी ‘नरोदनिक’ (जन-आंदोलनकारी) जैसे थे। वे एक छात्र की तरह जन-आंदोलनों में शामिल होते थे और अपनी विद्वता के बावजूद कभी यह नहीं सोचते थे कि वे उस औद्योगिक मज़दूर से ज़्यादा जानते हैं, जिसके साथ वे चल रहे हैं। उन्होंने हमेशा जन-आंदोलनों के जोश को सही दिशा देने और अकादमिक जगत में भी वैसी ही भावना जगाने की कोशिश की। दिल्ली यूनिवर्सिटी टीचर्स एसोसिएशन (डूटा) के विरोध-प्रदर्शनों में उनकी उत्साहपूर्ण और सक्रिय भागीदारी ने इस कोशिश को और मज़बूत किया।

प्रोफ़ेसर सरकार हमेशा अपने विचारों पर दोबारा सोचते और उनमें बदलाव करते रहते थे। लेकिन उनकी सोच में एक बात हमेशा एक जैसी रही : आरएसएस-भाजपा और एक राजनीतिक विचारधारा के रूप में ‘हिंदुत्व’ का उन्होंने हमेशा बिना किसी समझौते के विरोध किया। उनका यह विरोध उसी गहरी विश्लेषणात्मक सोच पर आधारित था, जो उनकी पहचान थी। ‘खाकी शॉर्ट्स एंड सैफ़्रन फ़्लैग्स : अ क्रिटिक ऑफ़ द हिंदू राइट’ और ‘फ़ासिज़्म : एसेज़ ऑन यूरोप एंड इंडिया’ नाम की दो किताबों में उनके योगदान को हर उस व्यक्ति को बार-बार पढ़ना चाहिए, जो उस सर्वव्यापी ताकत को समझना चाहता है, जो आज भारत पर राज कर रही है।

प्रोफ़ेसर सुमित सरकार अब हमारे बीच नहीं रहे। लेकिन उनका हर बात पर सवाल उठाने वाला और लीक से हटकर सोचने का नज़रिया, साफ़-सुथरे और साधारण आख्यानों को नापसंद करना, और घटनाओं की गहराई में जाकर उनके पीछे की ताकतों को पहचानने का उनका शानदार तरीका — ये सब चीजें उनके हज़ारों प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष छात्रों के बीच आज भी ज़िंदा है। इसके साथ ही, एक संप्रभु, समाजवादी, धर्मनिरपेक्ष और लोकतांत्रिक गणराज्य के प्रति उनकी प्रतिबद्धता और देश के लोगों में उनका अटूट विश्वास भी कायम है। जब तक उनके बताए तरीके और उनके माने हुए आदर्श इतने सारे लोगों के दिलों में ज़िंदा रहेंगे, तब तक उनकी सोच और उनका प्रभाव भी जीवित रहेगा।

[ • लेखक रबीकर गुप्ता शोधार्थी हैं. अंग्रेजी से हिंदी में अनुवाद संजय पराते संजय पराते ने किया है. ]

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Remembering Professor Sumit Sarkar : The Irreverent Historian Who Disdained Tidy Narratives- By Rabikar Gupta

August 13th, 2026, was a day when Cleo, muse of history, wept. For one of her greatest devotees, Professor Sumit Sarkar, foremost of the eminent historians of modern India, breathed his last. Eighty-seven years old, Professor Sarkar lost his long battle with illness on that day. He was survived by his wife, eminent historian Tanika Sarkar, and his son, Aditya Sarkar. The loss of Professor Sarkar is not merely the loss of a person. It is as if an institution whose constant presence we had taken for granted for so long a time suddenly crumbled. With his demise, the ever-vanishing rank of those intellectuals who believe that the task of the intelligentsia is not limited to publishing papers and writing monographs for career advancement sitting in ivory towers thinned yet again.

Professor Sarkar was born in 1939 in a Brahmo family in Calcutta. The conviction that powered much of his academic endeavor and non-academic activism was nurtured and shaped here. His father, Professor Susobhan Chandra Sarkar, taught history at Presidency College. He was one of the early pioneers of Marxist historical analysis and a longtime friend of the Communist Party of India. Sumit Sarkar followed in his father’s footsteps. He completed his post-graduation at Presidency College and earned his PhD from Calcutta University. He taught history for a time at Burdwan and Calcutta University before shifting to Delhi. Professor Sarkar started teaching history at Delhi University in 1974 and, despite every opportunity to move to greener pastures, gave this institution three decades of his life.

Professor Sarkar taught in a manner that was revolutionary at that time (perhaps even now). The first half of his classes seemed like a typical lecture. He presented in front of the students a standard historical narrative about the topic of the day, supported by various facts. But halfway through the class, just when the students thought they grasped what the professor was driving at, Sarkar used to pivot. After painstakingly building up a narrative, he would then systematically demolish and deconstruct it using facts that were ignored, voices that were forgotten, and texts that could be reinterpreted in a different light. Like magic, the narrative rearranged itself, many times telling a completely different story than what the class initially thought it was going to be. Through this whole exercise, Professor Sarkar used to teach his students two crucial things: a) there is no dogma too entrenched, no narrative too unassailable, no event too holy to be deconstructed and reinterpreted in the light of new facts, and b) he inculcated among his students Marx’s favorite maxim, ‘De omnibus dubitandum’ or ‘doubt everything’.

Professor Sarkar, adhering to the dialectical view of history, saw it as something that is always in motion. He never believed in a neat, clean, and simplified version of events and always looked out for the various multifaceted historical tendencies and forces, with all their complexities and nuances, that always lurk beneath neat and tidy narrations. We can see this approach from his very first book, which was also his PhD thesis, The Swadeshi Movement in Bengal, 1903-1908, published in 1973. In this book, Sumit Sarkar takes a movement about which all had apparently been said and then drives a sledgehammer through that neat, clean, and tidy national narrative. Using various sources like newspaper articles, dramas, poems, and even unpublished memoirs, Sarkar reinterpreted the Swadeshi movement. He dragged history out of dusty archives and into the vibrant arena of culture and public memories. His revolutionary usage of these kinds of sources has now become a standardized practice, but only because he showed the way.

All events of the national movement until then were considered something of a hallowed ground where a historian could only step reverently. Professor Sarkar was nothing if not an irreverent iconoclast. His irreverent but impartial scrutiny parted the veil of national mythology surrounding the Swadeshi movement, exposing hitherto unnoticed and unanalyzed limitations of the ‘Bhadralok’ leadership, who were always anxious to keep the movement within their control, the usage of Hindu symbols and specific cultural framing associated with the movement that were exploited by the British to keep the Muslim masses away from it, and militant labor mobilizations that created ‘pressure from below’.

Sarkar then took the methods used in this book and applied them to a far larger frame—the whole period of the freedom struggle from the late 19th century until independence. The resulting work was perhaps Prof. Sarkar’s most famous book, Modern India, 1885-1947. This thick red book, beloved by millions of students of history across multiple generations, was the vehicle that took Sumit Sarkar’s approach to history even to the most remote of colleges. The aim of this book was not mere narration of facts, and the author makes it very clear from the get-go. Every other sentence contains Sarkar’s unique brand of analysis that systematically dismantled the myth of a neat, tidy, homogenous and unidirectional freedom struggle and revealed the various forces with vastly different agendas that drove the movement. Congress in Sumit Sarkar’s work emerges not as a party, but as a platform. The workers, the peasants, and the Adivasis leapt from the pages not as some helpless mass directed by ‘national leaders’, but as forces with their own agency and agendas that in many cases managed to create such huge pressure from below that the very direction of the freedom struggle was changed, with ‘national leaders’ scrambling to catch up to the people. ‘Popular’ Movements and ‘Middle Class’ Leadership in Late Colonial India is one of Prof. Sarkar’s more unique works. He demonstrates how ‘Middle Class’ leadership was always anxious to channelize the energy of ‘Popular’ movements toward their designated aim, but at the same time deeply feared any kind of social revolution generating from it. These novel analyses were backed by Sarkar’s effortless command of a mind-bogglingly huge range of subjects. How widely he read can be understood by reading his Writing Social History, a collection of his essays, where he deals with subjects as varied as E.P. Thompson’s relevance in Indian history writing to the intellectual and social world of Vidyasagar.

One of the greatest traits of Prof. Sarkar was that his own works were not immune to his method of iconoclastic, skeptical, and irreverent analysis. According to him, there is no final say in history. Historical questions of the day change with time, and so does the analysis of history. At the end of his career, when most academicians rest on their laurels, Sumit Sarkar looked back and found his most influential work, Modern India, 1885-1947, had become grossly outdated and could no longer provide answers to contemporary questions. His solution was completely rewriting the book from the ground up. The resulting work, Modern Times: India 1880s-1950s, incorporated and touched on various topics as diverse as gender, environment, and cinema. The whole framing of the book shifted. There are very few examples of such a radical revision of a book by any historian. This same constant skepticism of one’s own work was behind his questioning of the direction taken by the ‘Subaltern Group’ in the late ’80s, a group as part of which he spent a considerable amount of his time and contributed substantially.

Professor Sarkar believed that his duty did not end with the analysis of ‘pressure from below’ and writing about subaltern classes whose voices had been suppressed by the powerful. His convictions time and again led him to abandon the ivory towers of academia and join the masses in the street. Prof. Sarkar, like all things, did not see people as something sacred, infallible, and always right. But he believed that it was always his duty to stand with the people. He was something of an old Russian Narodnik in this matter. He participated in mass movements with the attitude of a student and never presumed because of his erudition that he knew more than the industrial worker he was walking beside. He always tried to harness the fire of mass movements and inculcate the same spirit inside academia. His enthusiastic and active participation in the protests of the Delhi University Teachers’ Association (DUTA) underscored this effort.

Prof. Sarkar always revisited and revised his views. But there was one thing that was constant in his thinking: that was his uncompromising opposition to the RSS-BJP and ‘Hindutva’ as a political ideology. His opposition was grounded in the same deep analytical thinking that was his hallmark. His contributions to two edited volumes, namely Khaki Shorts and Saffron Flags: A Critique of the Hindu Right and Fascism: Essays on Europe and India, should be read and re-read by anyone who wants to understand the all-pervasive force that is now ruling India.

Prof. Sumit Sarkar is no more. But his skeptical and irreverent outlook, his disdain for neat, tidy, and simplified narratives, and his brilliant method of identifying underlying forces by deconstructing events live on among hundreds and thousands of his direct and indirect students. So does his commitment to a sovereign, socialist, secular, democratic republic and his endless faith toward its people. As long as the methods championed and ideals cherished by him are still alive among so many souls, his spirit will live on.

[ •Author is a Research Student ]

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आरंभ साहित्यिक मंच : बांग्ला-हिंदी के सुविख्यात प्रगतिशील परंपरा के छोटी-छोटी कविताओं के रचनाशील कवि पल्लव चटर्जी

पावस रचना : दीप्ति श्रीवास्तव
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पावस रचना : दीप्ति श्रीवास्तव

आरंभ साहित्यिक मंच – अर्पिता चौधुरी
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आरंभ साहित्यिक मंच – अर्पिता चौधुरी

इस माह के ग़ज़लकार : सुशील यादव
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इस माह के ग़ज़लकार : सुशील यादव

आरंभ साहित्यिक मंच : शुचि ‘भवि’
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आरंभ साहित्यिक मंच : शुचि ‘भवि’

आज पढ़ें ‘आरंभ’ साहित्यिक मंच में बांग्ला और हिंदी के सुस्थापित कवि पल्लव चटर्जी
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आज पढ़ें ‘आरंभ’ साहित्यिक मंच में बांग्ला और हिंदी के सुस्थापित कवि पल्लव चटर्जी

इस माह की कवयित्री : शुचि ‘भवि’
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इस माह की कवयित्री : शुचि ‘भवि’

आरंभ साहित्यिक मंच : संध्या जैन
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आरंभ साहित्यिक मंच : संध्या जैन

कवि और कविता : इस माह के कवि में नीलमचंद सांखला
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कवि और कविता : इस माह के कवि में नीलमचंद सांखला

‘आरंभ’ साहित्यिक मंच : दीप्ति श्रीवास्तव
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‘आरंभ’ साहित्यिक मंच : दीप्ति श्रीवास्तव

‘आरंभ’ साहित्यिक मंच : सुरभि ताम्रकार ‘शावि’
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‘आरंभ’ साहित्यिक मंच : सुरभि ताम्रकार ‘शावि’

आरंभ साहित्यिक मंच : सोनिया नायडू
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आरंभ साहित्यिक मंच : सोनिया नायडू

कहानी

लेख : कैलाश जैन बरमेचा
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लेख : कैलाश जैन बरमेचा

कहानी : दीप्ति श्रीवास्तव
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कहानी : दीप्ति श्रीवास्तव

लघु कथा : डॉ. प्रेमकुमार पाण्डेय
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लघु कथा : डॉ. प्रेमकुमार पाण्डेय

लघुकथा : सरस सलिला – दीप्ति श्रीवास्तव
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लघुकथा : सरस सलिला – दीप्ति श्रीवास्तव

आलेख : ‘बहकता बचपन’ – साजिद अली ‘सतरंगी’
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आलेख : ‘बहकता बचपन’ – साजिद अली ‘सतरंगी’

स्वर्ग का न्याय : महेश की आत्मकथा – लेखक शायर नावेद रज़ा दुर्गवी
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स्वर्ग का न्याय : महेश की आत्मकथा – लेखक शायर नावेद रज़ा दुर्गवी

कहानी : ‘पीहू’ – डॉ. दीक्षा चौबे
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कहानी : ‘पीहू’ – डॉ. दीक्षा चौबे

संदेशप्रद लघु कथा : ‘पुकार’ – कैलाश बरमेचा जैन
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संदेशप्रद लघु कथा : ‘पुकार’ – कैलाश बरमेचा जैन

लेखिका विद्या गुप्ता की कृति ‘मैं हस्ताक्षर हूँ’ की समीक्षा लेखक कवि विजय वर्तमान के शब्दों में – ‘मैं हस्ताक्षर हूँ’ यह विद्या गुप्ता की सच्ची, निर्भीक और सर्व स्वीकार्य घोषणा है
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लेखिका विद्या गुप्ता की कृति ‘मैं हस्ताक्षर हूँ’ की समीक्षा लेखक कवि विजय वर्तमान के शब्दों में – ‘मैं हस्ताक्षर हूँ’ यह विद्या गुप्ता की सच्ची, निर्भीक और सर्व स्वीकार्य घोषणा है

मास्टर स्ट्रोक [व्यंग्य] : राजशेखर चौबे
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मास्टर स्ट्रोक [व्यंग्य] : राजशेखर चौबे

लघु कथा : डॉ. सोनाली चक्रवर्ती
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लघु कथा : डॉ. सोनाली चक्रवर्ती

सत्य घटना पर आधारित कहानी : ‘सब्जी वाली मंजू’ :  ब्रजेश मल्लिक
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लघुकथा : डॉ. सोनाली चक्रवर्ती
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लघुकथा : डॉ. सोनाली चक्रवर्ती

कहिनी : मया के बंधना – डॉ. दीक्षा चौबे
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कहिनी : मया के बंधना – डॉ. दीक्षा चौबे

🤣 होली विशेष :प्रो.अश्विनी केशरवानी
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🤣 होली विशेष :प्रो.अश्विनी केशरवानी

चर्चित उपन्यासत्रयी उर्मिला शुक्ल ने रचा इतिहास…
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चर्चित उपन्यासत्रयी उर्मिला शुक्ल ने रचा इतिहास…

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रचना आसपास : उर्मिला शुक्ल

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रचना आसपास : दीप्ति श्रीवास्तव

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कहानी : संतोष झांझी

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कहानी : ‘ पानी के लिए ‘ – उर्मिला शुक्ल

लेख

‘साहित्य सृजन परिषद्’ के तत्वावधान में पावस ऋतु पर सरस काव्य गोष्ठी 26 जुलाई को इंदिरा गाँधी उच्चत्तर माध्यमिक विद्यालय सुपेला-भिलाई में अपराह्न 2.30 बजे से
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‘साहित्य सृजन परिषद्’ के तत्वावधान में पावस ऋतु पर सरस काव्य गोष्ठी 26 जुलाई को इंदिरा गाँधी उच्चत्तर माध्यमिक विद्यालय सुपेला-भिलाई में अपराह्न 2.30 बजे से

रवींद्र-नज़रूल उत्सव-2026 : ‘बंगीय साहित्य संस्था’ के तत्वावधान में रवींद्र-नज़रूल उत्सव 25 जुलाई को ‘ऑफिसर्स एसोसिएशन प्रगति भवन’ में प्रात:11.00 बजे से रात 8.00 बजे तक
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रवींद्र-नज़रूल उत्सव-2026 : ‘बंगीय साहित्य संस्था’ के तत्वावधान में रवींद्र-नज़रूल उत्सव 25 जुलाई को ‘ऑफिसर्स एसोसिएशन प्रगति भवन’ में प्रात:11.00 बजे से रात 8.00 बजे तक

काव्य संध्या : प्रगतिशील कवि डॉ. प्रेमकुमार पाण्डेय के निवास में दिव्या सक्सेना, विजया भारती, गजेंद्र द्विवेदी ‘गिरीश’, पारुल पांडेय, संजय मैथिल, युसूफ सागर, हाजी रियाज़ खान गौहर, मनमोहन मतवाला, ओम पांडेय, डॉ. नौशाद अहमद सिद्दीकी ‘सब्र’, छ्गनलाल सोनी, संतराम वर्मा और डॉ. आरबी कुशवाहा शामिल हुए
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काव्य संध्या : प्रगतिशील कवि डॉ. प्रेमकुमार पाण्डेय के निवास में दिव्या सक्सेना, विजया भारती, गजेंद्र द्विवेदी ‘गिरीश’, पारुल पांडेय, संजय मैथिल, युसूफ सागर, हाजी रियाज़ खान गौहर, मनमोहन मतवाला, ओम पांडेय, डॉ. नौशाद अहमद सिद्दीकी ‘सब्र’, छ्गनलाल सोनी, संतराम वर्मा और डॉ. आरबी कुशवाहा शामिल हुए

विशेष : भाईदूज, भाई-बहन के परस्पर प्रेम और दायित्व का त्योहार : भाईदूज और रक्षा बंधन की सनातनी मान्यताएं – श्रीमती संजीव ठाकुर
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तीन लघुकथा : रश्मि अमितेष पुरोहित

व्यंग्य : देश की बदनामी चालू आहे ❗ – राजेंद्र शर्मा
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लघुकथा : डॉ. प्रेमकुमार पाण्डेय [केंद्रीय विद्यालय वेंकटगिरि, आंध्रप्रदेश]

जोशीमठ की त्रासदी : राजेंद्र शर्मा
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18 दिसंबर को जयंती के अवसर पर गुरू घासीदास और सतनाम परम्परा
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जयंती : सतनाम पंथ के संस्थापक संत शिरोमणि बाबा गुरु घासीदास जी
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व्यंग्य : नो हार, ओन्ली जीत ❗ – राजेंद्र शर्मा
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🟥 अब तेरा क्या होगा रे बुलडोजर ❗ – व्यंग्य : राजेंद्र शर्मा.
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🟥 प्ररंपरा या कुटेव  ❓ – व्यंग्य : राजेंद्र शर्मा
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🟥 प्ररंपरा या कुटेव ❓ – व्यंग्य : राजेंद्र शर्मा

▪️ न्यायपालिका के अपशकुनी के साथी : वैसे ही चलना दूभर था अंधियारे में…इनने और घुमाव ला दिया गलियारे में – आलेख बादल सरोज.
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▪️ मशहूर शायर गीतकार साहिर लुधियानवी : ‘ जंग तो ख़ुद ही एक मसअला है, जंग क्या मसअलों का हल देगी ‘ : वो सुबह कभी तो आएगी – गणेश कछवाहा.
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▪️ मशहूर शायर गीतकार साहिर लुधियानवी : ‘ जंग तो ख़ुद ही एक मसअला है, जंग क्या मसअलों का हल देगी ‘ : वो सुबह कभी तो आएगी – गणेश कछवाहा.

▪️ व्यंग्य : दीवाली के कूंचे से यूँ लक्ष्मी जी निकलीं ❗ – राजेंद्र शर्मा
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▪️ व्यंग्य : दीवाली के कूंचे से यूँ लक्ष्मी जी निकलीं ❗ – राजेंद्र शर्मा

25 सितंबर पितृ मोक्ष अमावस्या के उपलक्ष्य में… पितृ श्राद्ध – श्राद्ध का प्रतीक
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25 सितंबर पितृ मोक्ष अमावस्या के उपलक्ष्य में… पितृ श्राद्ध – श्राद्ध का प्रतीक

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🟢 आजादी के अमृत महोत्सव पर विशेष : डॉ. अशोक आकाश.

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🟣 अमृत महोत्सव पर विशेष : डॉ. बलदाऊ राम साहू [दुर्ग]

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🟣 समसामयिक चिंतन : डॉ. अरविंद प्रेमचंद जैन [भोपाल].

राजनीति न्यूज़

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मुख्यमंत्री भूपेश बघेल ने उदयपुर हत्याकांड को लेकर दिया बड़ा बयान

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■छत्तीसगढ़ :

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भारतीय जनता पार्टी,भिलाई-दुर्ग के वरिष्ठ कार्यकर्ता संजय जे.दानी,लल्लन मिश्रा, सुरेखा खटी,अमरजीत सिंह ‘चहल’,विजय शुक्ला, कुमुद द्विवेदी महेंद्र यादव,सूरज शर्मा,प्रभा साहू,संजय खर्चे,किशोर बहाड़े, प्रदीप बोबडे,पुरषोत्तम चौकसे,राहुल भोसले,रितेश सिंह,रश्मि अगतकर, सोनाली,भारती उइके,प्रीति अग्रवाल,सीमा कन्नौजे,तृप्ति कन्नौजे,महेश सिंह, राकेश शुक्ला, अशोक स्वाईन ओर नागेश्वर राव ‘बाबू’ ने सयुंक्त बयान में भिलाई के विधायक देवेन्द्र यादव से जवाब-तलब किया.

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भिलाई कांड, न्यायाधीश अवकाश पर, जाने कब होगी सुनवाई

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स्मृति शेष- बाबू जी, मोतीलाल वोरा

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छत्तीसगढ़ कांग्रेस में हलचल

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राज्यसभा सांसद सुश्री सरोज पाण्डेय ने छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री भूपेश बघेल से कहा- मर्यादित भाषा में रखें अपनी बात

मुख्यमंत्री श्री भूपेश बघेल  ने डाॅ. नरेन्द्र देव वर्मा पर केन्द्रित ‘ग्रामोदय’ पत्रिका और ‘बहुमत’ पत्रिका के 101वें अंक का किया विमोचन
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प्रमोद सिंह राजपूत कुम्हारी ब्लॉक के अध्यक्ष बने

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ओवैसी की पार्टी ने बदला सीमांचल का समीकरण! 11 सीटों पर NDA आगे

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छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री भूपेश बघेल, ग्वालियर में प्रेस वार्ता

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अमित और ऋचा जोगी का नामांकन खारिज होने पर बोले मंतूराम पवार- ‘जैसी करनी वैसी भरनी’

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छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री, भूपेश बघेल बिहार चुनाव के स्टार प्रचारक बिहार में कांग्रेस 70 सीटों में चुनाव लड़ रही है

सियासत- हाथरस सामूहिक दुष्कर्म
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पत्रकारों के साथ मारपीट की घटना के बाद, पीसीसी चीफ ने जांच समिति का किया गठन