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विशेष : कुश जयंती और रक्षा बंधन- एनएल मौर्य ‘प्रीतम’

कुश जयंती और रक्षा बंधन का आपसी संबंध
कौशल जयंती (माता कौशल्या जन्मोत्सव) और रक्षा बंधन (रक्षा मंत्र) दोनों ही सनातन संस्कृति के पावन और पवित्र प्रसंग हैं,जिनका आपस में गहरा आध्यात्मिक और सांस्कृतिक संबंध है।
माता कौशल्या और रक्षा बंधन की कथा -कौशल राज्य और संस्कार/छत्तीसगढ़ को प्राचीन काल में दक्षिण कौशल कहा जाता था जो भगवान राम और उनकी माता कौशल्या की भूमि है। माता कौशल्या ने अपने पुत्र श्रीराम को हमेशा धर्म, मर्यादा और रक्षा का पाठ पढ़ाया।
रक्षा मंत्र का महत्व -रक्षा बन्धन के समय जो प्रसिद्ध रक्षा सूत्र मंत्र बोला जाता है “येन बध्दो बलिराजा दानवेन्दो महाबल”वह अटूट संकल्प और सुरक्षा का प्रतीक है। भगवान राम और उनके आदर्शों में भी इसी अचल सुरक्षा और वचन बध्दता का भाव दिखाई देता है।
दोनों में मुख्य सामानताएं -सुरक्षा और वचन जैसे रक्षा बंधन पर भाई अपनी बहन की रक्षा का संकल्प लेता है, वैसे ही कौशल क्षेत्र की पौराणिक परंपरा में मातृशक्ति और धर्म की रक्षा सर्वोपरि मानी गई है। पवित्र धागा (रक्षा सूत्र) दोनों ही प्रसंगों में कलाई या बाह पर बंधा रक्षा सूत्र बुरी शक्तियों से बचाव और दीर्घायु की कामना करता है।
लवकुश जयंती -भगवान श्रीराम के दोनों पुत्रों लव एवं कुश की जयंती भी इसी पावन श्रावण पूर्णिमा के दिन मनाई जाती है।
इस दिन को कयी अन्य महत्वपूर्ण पर्वों और दिवसों के रूप में भी जाना जाता है। जैसे संस्कृत दिवस और गायत्री जयंती। एकही दिन कयी धार्मिक और ऐतिहासिक प्रसंग जुड़े होने के कारण इस पूर्णिमा तिथि का विषेश महत्त्व माना गया है।
जैन परम्परा में रक्षा बंधन का संबंध भाई बहन के रिश्ते से न होकर संतों और धर्म की रक्षा की इतिहासिक घटना से है।
मुख्य संबंध और कथा -700 जैन मुनियों की रक्षा/पौराणिक काल में श्रावण पूर्णिमा के दिन जैन मुनि बिष्णु कुमार ने अपनी ऋद्धि सिद्धि के बल पर हस्तिनापुर में फंसे 700 जैन संतों (मुनियों) के प्राणों की रक्षा की थी।
धर्म रक्षा का प्रतीक -राजा बलि के अंहकार और मंत्रियों व्दारा संतों पर किए जा रहे अत्याचार को विष्णु कुमार मुनि ने रोका था।इसी घटना की स्मृति में जैन अनुयाई इस दिन एक दूसरे को रक्षा सूत्र बांधकर धर्म और संयम की रक्षा का संकल्प लेते हैं।
श्रवण संस्कृति के रूप में जैन समाज मनाता है और संपूर्ण विश्व रक्षा बंधन पर्व मनाता है।
खीर का प्रसाद -इस दिन संकट से उभरे मुनियों को आहार (खीर और सेवयि) कराया गया था, इस लिए जैन घरों में विषेश रूप से खीर बनाई जाती है।
महाभारत काल में -महाभारत के युद्ध के दौरान जब श्री कृष्ण की अंगुली से खून निकल रहा था तब द्रौपदी ने अपनी साड़ी का पल्लू फाड़कर उनकी अंगुली पर बांध दिया था, इसके बदले कृष्ण ने द्रौपदी की रक्षा का वचन दिया था,इसे सबसे लोकप्रिय प़संग माना जाता है।
यम और यमुना -मृत्यु के देवता यमराज और उनकी बहन यमुना की कथा के अनुसार -यमुना ने अपने भाई को राखी बांधी थी जिससे प्रसन्न होकर यम ने उन्हें अमरता का वरदान दिया था।
रक्षा बंधन के साथ क्या है? भगवान शिव का संबंध -रक्षा बन्धन को लेकर सामाजिक जीवन में कयी मान्यताएं हैं, इस त्योहार से भगवान शिव का विशेष संबंध है। रक्षा बंधन का त्योहार श्रावण मास की मास की पूर्णिमा को मनाया जाता है, रक्षा बंधन को लेकर सामाजिक जीवन में कयी मान्यताएं हैं।
रक्षा बंधन और भगवान शिव का संबंध “चंद्रमा शिव के सिर पर विराजित है कल्पना कीजिए कि शिव सिर पर विराजित पूर्णमासी में महादेव को ज्योत्ना स्नान करा रहे हैं यानी चांदनी रात से शिव प्रकाशित हो रहें हैं”
पंडित शशिशेखर त्रिपाठी के मुताबिक सावन के शुक्ल पक्ष की पूर्णिमा के दिन शिव समस्त प्रकृति को रक्षा का वचन देते हैं। यह रक्षा वचन चाहे व्यक्ति से हो,या वचन से हो,या संबंध से हो,या राज्य से हो,या फिर परिजनों से हो।
“रक्षा का जो तत्व है वही शिव तत्व है, बहनों को भाई रक्षा का वचन देते हैं इसके पीछे भी शिव तत्व है।जिस प्रकार आस्तिक और नास्तिक शिव के निकट हों या दूर हों समस्त जीवों की रक्षा शिव करते हैं। किसी भी संकट में कोई बहन हो तो भाई रूपी शिव रक्षा का वचन निभाते हैं और इसके लिए सदैव तत्पर रहते हैं”
सावन मास अति पावन है
बम भोले के मन भावन है
• लेखक संपर्क-
• 83197 23617
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