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- ‘बंगीय साहित्य संस्था’ : इस सप्ताह ‘साहित्यिक विचार-विमर्श अड्डा-133’ में शामिल हुए- स्मृति दत्त, दुलाल समाद्दार, शुभेंदु बागची, पल्लव चटर्जी, प्रकाशचंद्र मण्डल, प्रदीप भट्टाचार्य, ब्रजेश मल्लिक, जीवन चंद्र हालदार, आलोक कुमार चंदा, सुजॉशा सेन, पं. बासुदेब भट्टाचार्य, तपन रॉय और रवींद्रनाथ देबनाथ
‘बंगीय साहित्य संस्था’ : इस सप्ताह ‘साहित्यिक विचार-विमर्श अड्डा-133’ में शामिल हुए- स्मृति दत्त, दुलाल समाद्दार, शुभेंदु बागची, पल्लव चटर्जी, प्रकाशचंद्र मण्डल, प्रदीप भट्टाचार्य, ब्रजेश मल्लिक, जीवन चंद्र हालदार, आलोक कुमार चंदा, सुजॉशा सेन, पं. बासुदेब भट्टाचार्य, तपन रॉय और रवींद्रनाथ देबनाथ

👉 [बाएँ से] • प्रकाशचंद्र मण्डल, प्रदीप भट्टाचार्य, रवींद्रनाथ देबनाथ, जीवन चंद्र हालदार, दुलाल समाद्दार, आलोक कुमार चंदा, पं. वासुदेब भट्टाचार्य, सुजॉशा सेन, स्मृति दत्त, पल्लव चटर्जी, ब्रजेश मल्लिक, शुभेंदु बागची और तपन रॉय
• छत्तीसगढ़ आसपास
• भिलाई
भिलाई निवास इंडियन कॉफ़ी हाउस से : बांग्ला भाषा, कला-संस्कृति एवं साहित्य को समर्पित ‘बंगीय साहित्य संस्था’ के तत्वावधान में इस सप्ताह 26 सितम्बर, 2026 को भिलाई निवास के इंडियन कॉफ़ी हाउस में साहित्यिक विचार-विमर्श अड्डा-133 में शामिल हुए- संस्था की उप सभापति स्मृति दत्त, महासचिव शुभेंदु बागची, बांग्ला साहित्यिक पत्रिका ‘मध्यबलय’ के संपादक एवं ‘खुकु दुलाल समाद्दार फाउंडेशन’ के संयोजक दुलाल समाद्दार, उपसचिव प्रकाशचंद्र मण्डल, कोषाध्यक्ष पल्लव चटर्जी, प्रगतिशील जन-विचारधारा की साहित्यिक संस्था ‘आरंभ’ के अध्यक्ष प्रदीप भट्टाचार्य, राष्ट्रवादी कवि ब्रजेश मल्लिक, बांग्ला के प्रगतिवादी कवि जीवन चंद्र हालदार, सुजॉशा सेन, तपन रॉय, पं. वासुदेब भट्टाचार्य, काव्य चिंतक आलोक कुमार चंदा और रवींद्रनाथ देबनाथ.
प्रारंभ में बंगीय सदस्यों ने सितम्बर माह में जन्में सदस्य प्रगतिशील कवि प्रदीप भट्टाचार्य और रतन सरकार का अवतरण दिवस मनाया.

👉 • बंगीय सदस्यों ने प्रदीप भट्टाचार्य का जन्मदिन हर्षोल्लास के साथ मनाया
प्रदीप भट्टाचार्य ने आत्मीय उद्गार प्रगट व्यक्त करते हुए कहा कि-
मेरी साहित्यिक यात्रा 40 वर्षों से जारी है. 20 वर्ष हुए पीत पत्रकारिता करते हुए. कविता के संदर्भ में मेरा व्यक्तिगत मत यह है कि साहित्य दूसरों के विचारों का ऐन्द्रिक संस्करण का उपनिवेश नहीं है, उसकी अपनी वैचारिक सत्ता है. साहित्य जल्दबाज़ी की जगह नहीं, धीरज का मुकाम है. मेरे आदर्श कवियों में एक कवि भगवत रावत है. हिंदी पखवाड़े पर मैं इनकी लिखी एक कविता का पाठ करता हूँ, सुनिए-
हिंदी-दिवस
एक सेवानिवृत्त हिंदी अध्यापक/नियम से साल में एक बार खादी का धोती-कुर्ता पहिनकर/सुबह से इस तरह निकलता है घर से जैसे निकला हो/देश को फिर से आजाद कराने/वह नियम से साल में एक बार पागलों की तरह/जो भी मिलता है उसे रोककर अपनी फटी-बेसुरी आवाज़ में/भारत में बच्चों की दीन-दशा वाला पुराना/रटा हुआ गाना सुनाता है/वह सबसे कहता है/’हिंदी में बोलो, हिंदी में गाओ/हिंदी में मिलोजुलो खुशियाँ मनाओ/हिंदी वालो अपने बच्चों को हिंदी पढ़ाओ/बच्चों को अंग्रेजी के बोझ के नीचे मत दबाओ/बच्चों को रहम करो/प्यारे माँ-बापों अपने बच्चों पर रहम करो’/फिर कभी-कभी सुर बदलकर/चौराहे पर खड़ा हो लगभग चिल्लाने लगता है/हे मातृभूमि पर बलि-बलि जाने वालों/प्यारे-प्यारे हिंदी भाषा-भाषियों/आओ-आओ सब मिलकर रोषहु भाई/देखो-देखो भारत दुर्दशा न देखी जाई/लेकिन कोई नहीं/कोई नहीं… कोई नहीं सुनता उसकी आवाज़/सब अपने-अपने बच्चों को सजाधजा कर/शहर से कस्बों तक/कस्बों से गाँवों तक/अंग्रेजी माध्यम में घसीटे लिए जा रहे है/बच्चे रोते हैं- बिसूरते हैं फिर एक दिन थककर/’ए’ फॉर ‘एपल’ बोलने लग जाते हैं/तब घरों में सत्यनारायण की कथा होती है/बर्थ डे पर केक काटे जाते हैं.
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उपस्थित सदस्यों ने गीत, ग़ज़ल, लघुकथा एवं प्रतिवेदन का पाठ किया. संचालन प्रकाशचंद्र मण्डल ने किया-


• सर्वप्रथम नाट्यकार प्रकाशचंद्र मण्डल लिखित नाटक का पाठ सुजॉशा सेन और प्रकाशचंद्र मण्डल ने संयुक्त रूप से किया. नाटक था- ‘सुख बिलाससेर आश्रम’

जीवन चंद्र हालदार ने ‘कत्लखाना’ शीर्षक से बांग्ला कविता पढ़ी/सुजॉशा सेन ने वीरेंद्रनाथ चक्रवर्ती रचित कविता ‘दु:खवो कोन से आलोर स्वप्नों निये…’/पं. वासुदेब भट्टाचार्य लघुकथा ‘चोर का धन’/ आलोक कुमार चंदा पल्लव चटर्जी लिखित कविता ‘ताबीज़’/ब्रजेश मल्लिक ने ‘सुख का संसार’/पल्लव चटर्जी ने ‘चापलुस मानुष’/दुलाल समाद्दार ने छोटी-छोटी कविता- ‘कवि’, ‘संकल्प’, ‘कचुपाता’, ‘जूता’ और ‘अंधा’ शीर्षक से महत्वपूर्ण रचनाओं का पाठ किया/स्मृति दत्त ने प्रतिवेदन ‘अंध विश्वास’/प्रकाशचंद्र मण्डल ने लघु कथा ‘पाखीर माया’ और प्रदीप भट्टाचार्य के जन्मदिन पर शुभकामनाएं संदेश कविता/शुभेंदु बागची ने ‘पियाआलरे आड़े रेर…’ और तपन रॉय ने ‘भाग्य’ को लेकर रचना का पाठ किया. पढ़ी गई सभी कविताएं, लघुकथा, मुक्तक, नाटक एवं विचार में अनुभव था, लोक-मन और प्रकृति की भाषा थी जो आत्मसजग आधुनिकता की भाषा से जोड़ते हैं. बांग्ला भाषा में पढ़ी गई कविता मन को गुदगुदा गई.

अड्डा-133 की अध्यक्षता स्मृति दत्त ने किया और आभार व्यक्त पल्लव चटर्जी ने दिया.
[ • रिपोर्ट एवं फोटो संयोजन- प्रदीप भट्टाचार्य ]
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