कृति और कृतिकार- वीणा सिंह

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• जीत की होड़

पैरों में बॅंधी बेड़ियों को
आज तोड़कर
रुख धाराओं का
विपरीत मोड़कर
बढ़ जाना मंज़िल की ओर
सबको छोड़कर
रख देना नेह सारा
तुम निचोड़कर
भीड़ में हो अकेले
तो क्या हुआ दोस्त
घर बसता है एक-एक
ईंटों को जोड़कर
यूं बुलंदियों के रास्ते
होते बड़े कठिन हैं
कर शून्य से शुरू
बस जीत की होड़ कर….
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• क्या प्रेम नहीं है?

उम्र के एक पड़ाव के बाद
प्रेम के अर्थ बदल जाते हैं
प्रेम दिखता है फिक्रों में
जिम्मेदारियों में
मुझे ड्यूटी से आने में देर होता देख
अपनी चाय की तलब छोड़
मेरे लिए दाल-भात बनाना
क्या प्रेम नहीं है?
जब मैं बालों में मेहंदी लगाऊं
तो बिन कहे गीज़र में पानी गर्म
कर देना
क्या प्रेम नहीं है??
मुझे ड्यूटी के लिए देर होता देख
बाॅटल टिफिन भर देना
और पूछना
कुछ करना है क्या ??
क्या प्रेम नहीं है ??
मेरी ड्यूटी निकलने से पहले
मेरी गाड़ी को चैक करना
कि सब ठीक तो है
क्या प्रेम नहीं है ??
क्या हुआ जो तुम
कोई उपहार नहीं देते
पर
बस से सफ़र पर निकलूं
तो हाथ में
चिल्हर थमाना
क्या प्रेम नहीं है??
अपनी व्यस्ततम ड्यूटी में भी
मेरी ट्रेन का समय देखते रहना
क्या प्रेम नहीं है ?
मेरे आई सी यू में भर्ती
रहने पर
चार रातें
पतले पोर्च
पर लेटकर
बिताना
क्या प्रेम नहीं है ??
मेरे बेबाकीपन पर
अपने मौन की
मुहर लगाना
क्या प्रेम नहीं है ??
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• लपटें

लपटें हैं जलती
चिंताओं की
अब तुम भी इसे
स्वीकार करो
छुई-मुई सी हैं
बहती धाराएं
अब इसका न
प्रतिकार करो
होने दो
स्वच्छंद
मन के कुत्सित
विचारों को
चाशनी-सा घुल
जाने दो
गुस्सों को,
उबारों को
निष्प्राण में प्राण
फूंक दो
देखो धक-धक
जीवनाकारों को
भस्म तिलक लो
श्रृंगारों का
तेज़ पड़ी
तलवार करो
धरती अपने पास और
आसमाॅं उस पार करो……
[ • कवयित्री वीणा सिंह प्रगतिशील जन-विचारधारा की साहित्यिक संस्था ‘आरंभ’ की आजीवन एवं प्रबंध-कार्यकारिणी की सदस्य हैं. ]
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chhattisgarhaaspaas
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