- Home
- Chhattisgarh
- लेख : हर जरूरत जरूरी नहीं होती, जरूरत उसकी हो सकती है, जरूरी हमें सोचना है- कैलाश जैन बरमेचा
लेख : हर जरूरत जरूरी नहीं होती, जरूरत उसकी हो सकती है, जरूरी हमें सोचना है- कैलाश जैन बरमेचा

👉 • जीवन बहुत छोटा है. इसलिए हर जगह उपस्थित होना आवश्यक नहीं है. आवश्यक यह है कि जहाँ भी जाएं, सम्मान के साथ जाएं, क्योंकि जरूरत तो कभी भी किसी को किसी की पड़ सकती है लेकिन जरूरी क्या है?
मनुष्य का जीवन केवल कमाने, खाने और समय बिताने के लिए नहीं मिला है। जीवन का सबसे बड़ा उद्देश्य है अपने अस्तित्व को समझना, अपने स्वाभिमान को बचाकर रखना और यह पहचानना कि हमें कहाँ उपस्थित होना चाहिए और कहाँ नहीं। आज के समय में लोग अक्सर हमें अपनी जरूरत के हिसाब से याद करते हैं। जब उन्हें भीड़ चाहिए होती है, तब हमारा महत्व बढ़ जाता है। जब उन्हें काम निकलवाना होता है, तब हमारी तारीफ होने लगती है। जब उन्हें अपने आयोजन को सफल दिखाना होता है, तब वे कहते हैं — “आपके बिना कार्यक्रम अधूरा है।” लेकिन सच्चाई यह है कि हर बुलावा सम्मान नहीं होता और हर मुस्कुराहट अपनापन नहीं होती।
जीवन में सबसे बड़ी समझ यह नहीं है कि कौन हमें बुला रहा है, बल्कि यह है कि वहाँ जाना हमारे लिए जरूरी भी है या नहीं। जरूरत सामने वाले की हो सकती है, लेकिन जरूरी क्या है, यह निर्णय हमें स्वयं लेना पड़ता है। कई बार हम लोगों की बातों में आकर वहाँ पहुँच जाते हैं जहाँ हमारी उपस्थिति का मूल्य नहीं होता। वहाँ केवल हमारा उपयोग होता है। काम निकलते ही वही लोग किसी और को खोज लेते हैं। तब मन के भीतर एक चोट पैदा होती है, जिसे शब्दों में व्यक्त करना कठिन होता है।
रुद्र नाम का एक युवक था। वह मिलनसार भी था और मदद करने वाला भी, लेकिन उसके भीतर एक बात बहुत स्पष्ट थी — वह अपने स्वाभिमान से कभी समझौता नहीं करेगा। उसका मित्र लक्ष्य हर जगह उपस्थित रहने में विश्वास रखता था। शहर में कोई भी आयोजन हो, कोई कार्यक्रम हो, कोई मंच हो, कोई स्वागत समारोह हो — लक्ष्य सबसे पहले पहुँच जाता था। उसे लगता था कि जितनी अधिक जगह लोग उसे बुलाएँगे, उतना ही उसका महत्व बढ़ेगा।
एक दिन शहर के एक बड़े कारोबारी ने लक्ष्य को फोन किया और कहा — “भाई, तुम्हारे बिना कार्यक्रम अधूरा रहेगा, जल्दी आ जाना।” यह सुनकर लक्ष्य बहुत खुश हुआ। उसने सोचा कि समाज में उसकी बहुत प्रतिष्ठा है। वह समय से पहले कार्यक्रम स्थल पहुँच गया। लेकिन वहाँ पहुँचते ही उसे छोटे-छोटे कामों में लगा दिया गया। कभी उसे गाड़ियाँ पार्क करवानी पड़ीं, कभी कुर्सियाँ लगवानी पड़ीं, कभी लोगों को पानी पिलाना पड़ा। मंच पर बड़े लोग बैठे थे और लक्ष्य पूरे समय इधर-उधर भागता रहा।
कार्यक्रम समाप्त होने के बाद भोजन का समय आया। जब वह खाने की ओर बढ़ा तो किसी ने कहा — “अरे आप बाद में खा लेना, पहले मेहमानों को संभालो।” यह सुनते ही उसके भीतर कुछ टूट गया। उसे पहली बार महसूस हुआ कि वहाँ उसकी इज्जत नहीं थी, केवल जरूरत थी। यदि वह नहीं होता तो उसकी जगह कोई और होता। उसका होना महत्वपूर्ण नहीं था, केवल उसका उपयोग महत्वपूर्ण था।
अगले दिन वह उदास बैठा था। तभी उसका मित्र रुद्र उससे मिलने आया। लक्ष्य ने पूछा — “तुम कल कार्यक्रम में क्यों नहीं आए? सब लोग पूछ रहे थे।” रुद्र हल्का सा मुस्कुराया और बोला — “जहाँ मेरी उपस्थिति से पहले मेरे स्वाभिमान को छोटा कर दिया जाए, वहाँ जाना मैं जरूरी नहीं समझता।”
लक्ष्य चुप हो गया। रुद्र ने आगे कहा — “देख, जरूरत उनकी थी, लेकिन जरूरी क्या है, यह मुझे तय करना था। अगर मैं अपनी इच्छा से जमीन पर बैठ जाऊँ तो वह मेरी विनम्रता है, लेकिन कोई मुझे मेरी औकात दिखाने के लिए नीचे बैठाए, तो वह मेरे स्वाभिमान का अपमान है। जीवन में विनम्र बनना अच्छी बात है, लेकिन स्वयं को अपमानित होने देना अच्छी बात नहीं है।”
रुद्र की बातें लक्ष्य के मन में उतरती चली गईं। उसे समझ आने लगा कि जीवन का अर्थ हर जगह दिखाई देना नहीं है। जीवन का अर्थ यह भी नहीं है कि लोग हमें कितनी बार बुलाते हैं। जीवन का वास्तविक अर्थ यह है कि हम कहाँ सम्मान के साथ खड़े हैं और कहाँ केवल इस्तेमाल हो रहे हैं।
इस संसार में कोई व्यक्ति छोटा या बड़ा उसके काम से नहीं होता। एक बड़ा होटल चलाने वाला भी पैसा कमाता है और सड़क किनारे ठेला लगाने वाला भी पैसा कमाता है। फर्क केवल इतना है कि कौन व्यक्ति अपना जीवन स्वाभिमान से जी रहा है। यदि मनुष्य के भीतर खुद्दारी है, तो वह छोटे से कार्य में भी बड़ा दिखाई देता है। लेकिन यदि वह बार-बार अपने सम्मान से समझौता करता है, तो बड़े पद पर बैठकर भी भीतर से छोटा हो जाता है।
जीवन में सहायता अवश्य करनी चाहिए। लोगों के दुःख में साथ देना चाहिए। तन, मन, धन और समय से योगदान देना चाहिए। लेकिन वह योगदान वहाँ होना चाहिए जहाँ अपनापन हो, संवेदना हो और सम्मान हो। जहाँ केवल उपयोग हो, जहाँ बार-बार अपमान मिले, जहाँ हमारे अस्तित्व को छोटा किया जाए, वहाँ से शांतिपूर्वक दूर हो जाना ही समझदारी है।
मनुष्य को इतना खुद्दार अवश्य होना चाहिए कि वह किसी की आँखों में आँख डालकर बात कर सके। क्योंकि जिस दिन इंसान अपने स्वाभिमान से समझौता करना शुरू कर देता है, उसी दिन भीतर से टूटना शुरू हो जाता है। दुनिया की सबसे बड़ी सफलता वही है जिसमें मनुष्य विनम्र भी रहे, सहायक भी रहे, लेकिन अपने सम्मान को कभी गिरने न दे।
जीवन बहुत छोटा है। इसलिए हर जगह उपस्थित होना आवश्यक नहीं है। आवश्यक यह है कि जहाँ भी जाएँ, सम्मान के साथ जाएँ। क्योंकि जरूरत तो कभी भी किसी को किसी की पड़ सकती है, लेकिन जरूरी क्या है — यह निर्णय हमेशा अपने आत्मसम्मान को सामने रखकर लेना चाहिए। तभी जीवन सच में सफल और सार्थक बनता है।

👉 • प्रगतिशील जन-विचारधारा की साहित्यिक संस्था ‘आरंभ’ के मुख्य संरक्षक कैलाश जैन बरमेचा निरंतर लेखन के साथ-साथ सामाजिक कार्यों में भी बढ़-चढ़कर हिस्सा लेते हैं. कई सामाजिक संस्थाओं के साथ खेल एवं संगीत में भी इनकी गहरी रुचि है. • आप ‘छत्तीसगढ़ पावर लिफ्टिंग संगठन’ एवं ‘जिला-दुर्ग शतरंज संघ’ के भी अध्यक्ष हैं. ]
🟥🟥🟥
chhattisgarhaaspaas
विज्ञापन (Advertisement)