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छत्तीसगढ़ी कहिनी : ‘फूलकुँवर’- डॉ. दीक्षा चौबे
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• ‘फूलकुँवर’
– डॉ. दीक्षा चौबे
[ छत्तीसगढ़-दुर्ग ]

“कुख्यात नक्सली जोड़ा मारा गया “ अखबार म ए समाचार संग ओखर फोटो ल देखिस त रमा के देह मा कँपकँपी छूटगे। फूलकुँवर अउ नक्सली ? सुरता के गोंदली के एक-एक ठिन फाँक हर धीरे-धीरे ओदरे लागिस। तीस साल पहिली रमा के नौकरी धुर आदिवासी इलाका भानुप्रतापपुर के तीर पिच्चेटोला म लगिस तव जात जात ओला रोआसी लाग गिस। दल्लीराजहरा ले बीस किलोमीटर दूरिहा बस मां चढ़ के जात रहिस, रोड म उतर के चार किलोमीटर रेंगत जाय बर परतिस। तेमा बीच म एक ठिन बरसाती नाला रहय, बारों महीना ओमा पानी भरे रहय। एक जोड़ कपड़ा धर के ले जाय बर परय। कभू नाला म पूरा रहय त कपड़ा बदले बर तको पड़ जात रहय। अतेक अंदर के गाँव तिहाँ स्कूल म पढ़ाये बर दू झन मास्टर । आठवीं तक कक्षा रिहिस , हाईस्कूल पढ़े बर लइका मन ला भानुप्रतापपुर जाय बर परतिस।
लइका मन ल लिखे पढ़े सिखोना बड़े मुश्किल के काज ए , तेमा जेमन दुनिया के कुछु खोज खबर नई राखय उमन ल समझाना अउ कठिन। आजकल कस फोन अउ इंटरनेट के जमाना नइ रिहिस -”कुछु जानना हे फट ले गूगल ल खोल ले ।” ओ बेर तो लइका मन ल देश दुनिया के कुछु खोज खबर नई राहय। ओमन के निच्चट कम जानकारी के सेतीर रमा ल पढ़ाय म बिकट मुश्किल आवय। रमा ल सुरता रिहिस के ओहर अंगरेजी के एक ठिन पाठ ल पढ़ावत रिहिस “ द विलियम्स टेल “
ओमा कहिनी म एपल माने सेबफल के ऊपर निशाना लगाय के गोठ रिहिस। लइका मन पूछिन -” सेबफल काला कहिथे मैडम ?”
रमा के दिल हर धक्क ले कर दिस। सीखे बर दिमाग म जिनिस मन के चित्र बनथे फेर जेन मन ओ जिनीस ल देखेच नइये ओमन कइसे बिचारही। दूसर दिन रमा हर पाव भर सेब लेके गइस, लइका मन के खुशी हर देखे लाइक रिहिसे। नान नान कुटका काट के सबो झन ल खवाइस ओखर बाद ऊमन ल पाठ पढ़ाइस। घाम म रमा हर छाता धर के गिस त पहिली त ऊमन हाँसिन –” बिन बरसात के ए मैडम हर छाता धर के आय हे”।
“घाम लागे म चलो छाता ओढ़थें जी” रमा हर लजावत कहिस । जानकार नइ रिहिन फेर अब्बड़ मयारुक रिहिन उहाँ के मनखे, खवाये पियाय बर हरदम तियार
। कुछु काँही बारी के साग खुशी खुशी दे दँय । नाला म पूरा आतीस तो ओला बताय आवँय –”झटकुन घर जा मैडम , पानी हर बाढ़त हे” कितना भी समय होय रहितिस रमा अउ ओखर संगवारी ल लकर-धकर भागे ल परय । पाछू ओ नाला म पुलिया बनिस फेर ओतेक ऊँच नइ बनाय रिहिन तेरा पाय के बरसात म उहू भर जाय ।
छलाछल भरे तरिया म फूले कमल कस सुग्घर रिहिस फूलकुँवर ।ओखर भोलापन अउ सादगी कोनो के ध्यान ल खींच लय। ओखर बड़े-बड़े आँखी म अतेक सवाल रहय जानो मानो ओहर पूरा दुनिया ल जान के रिही। आठवीं तक ओला रमा पढ़ाइस तहाँ ले ओहर आघू के पढ़ाई करे बर अपन चाचा-चाची घर चल दिस । ओखर चाचा हर स्कूल के पढ़ाई ऊँखरे घर रहि के गाँव म पढ़े रहिसे तहाँ ले ओखर नौकरी लग गये त ओहर भिलाई म रहे लागिस । छुट्टी म गाँव आवय त फूलकुँवर रमा तिर भेंट करे आबेच करय। पढ़े-लिखे म बने तेज रिहिस तो रमा ल विश्वास रिहिस कि ओहर कुछु न कुछु जरूर बनही फेर नक्सली बन जाही अइसन त कोनो सपनाय तको नइ होही।
पेपर म जब ले ओ फोटू देखे रिहिस, रमा हर अपन अतीत ले बाहर नइ आ पात रहिस। ओला सुरता आइस के एक बेर ओ गाँव के एक झन लइका हर एक ठिन लिस्ट धर के आय रिहिस अउ कहिस–” मैडम आप मन के घर दुरुग म हे , उहाँ ले ए समान ला दुहूं का । ओखर हाथ म पाँच-पाँच सौ के कई ठन नोट रहिस। “ ले अभी पइसा ल रहन दे , देखथँव मिलही धन नहीं “ कहिके ओहर ओ लिस्ट ल बिन पढ़े धर लिस । घर म आके पढ़िस तो ओखर माथा हर ठनक गे। रमा हर रसायनशास्त्र म एम एस सी रहिसे । ओ समान ल देखिस त अकबका गे । ओ बम बनाय के रसायन रहिसे। ए सब समान ल ए लइका का करही? ओहर सोचे लागिस । ओ समय ओ डहर कुछु नइ रिहिस फेर भानुप्रतापपुर के जंगल डहर नक्सली मन बड़ उत्पात मचाय रहँय । ओ लइका हर कोनो नक्सली ले तो नइ मिले होही रमा हर मने मन बिक्कट घबरा गे अउ दूसरे दिन ओहर कुछु समझे नहीं कस “ ए समान मन नइ मिलिन” कहि के लिस्ट ल वापिस कर दिस। ओ दिन ले ओ जादा गाँव के आदमी मन ले गोठियाय बताय कमती कर दिस -” कोन जानी कोन आदमी का भेस म आ जाथे कुछु पता नइ चलय “। पक्का अइसनहे कोनो नक्सली संग फूलकुँवर हर फँस गे। ओ सुकुमारी , फूल कस देह तेन हर बंदूक उठाय सकही अउ कोनो के जान लेही…ए गोठ ल पतियाय के मन नइ होवत रिहिस।
दिन भर रमा के मन हर इही उधेड़बुन म लगे रिहिस के ए गोठ हर सच्ची होही के कोनो ओला झूठ-मूठ केस म फँसा दिस। अइसनहो गोठ सुने बर मिलथे कि नक्सली के भोरहा म सीधा-सीधा गाँव के मनखे मन सपड़ा जाथें। फेर अतेक बड़ घटना जेन अखबार के मुख्य पेज म छपे हे तेन हर झूठ नइ होय सकय। पत्रकार मन अतेक बड़ गलती नइ करंय । फूल कस नाजुक टुरी हर मार-काट करइया नक्सली मन करा कइसे जुड़ गे एखरो कुछु किस्सा तो होबे करही। रमा के मन हर बिन पानी के मछरी कस छटपटावत रिहिस। तीस बछर पहिली सब्बो झन करा फोन तको नइ रहय, ओ टाइम के संघरा रहवइया कोनो के फोन नंबर नइहे के ओखर बारे म बूझ पातीस। अइसनहे गोठ आइस गईस होगे । एक महीना बाद एक ठिन बिहाव म ओखर संग म काम करइया देवांगन मैडम ले भेंट होइस। बिकट साल बाद दुनों संगवारी सुख-दुख गोठियाइन, तहाँ फूलकुँवर के गोठ निकल गे। ओहर जौन किस्सा सुना इस त रमा के हाथ-गोड़ हर ठंडा पड़ गे।
फूलकुँवर के एक झिन चाचा हर ऊँखर घर मा रहि के पढ़त रहिस तोला सुरता हे का मैडम ?
“ हव- भेंट तको होय रिहिस ओखर तो नौकरी लगगे रिहिस अउ बिहाव तको होगे होही “ –रमा हर किहिस।
ओखरे लइका होवइया रिहिस त फूलकुँवर हर चाची संग रहे बर गे रिहिस। कइसे-कइसे मनखे जनमथे ए दुनिया म…कंस रावण कस राक्षस मन तको ईंखर आघू फेल हे । संग-संग खेले कूदे बचपन ले देखे लइका बर
ओ राक्षस के नीयत बिगड़ गे। ओला कुरिया म धांध के एक नहीं कई बेर ओखर इज्जत ल बिगाड़िस। एक दिन कोनो खिड़की खुला रहिगे त चाची अउ पड़ोसी के मदद लेके उहाँ ले भागिस । अपन घर आके माँ-बाप ल सब किस्सा सुनाइस त ओखर खिलाफ थाना म रिपोर्ट दर्ज करके आइन । पुलिस ओखर चाचा ल पकड़ के लेगे अउ जेल म डार दिस। इही कमजोर बखत म ओखर घर तीर के लइका रामदेव संग ओखर संबंध गहरागे। ओहर थाना कचहरी के काम म बिकट मदद करिस। फेर एक दिन कथे–” अइसन राक्षस मन ल जिये के अधिकार नइहे, जेल ले छूट के आही तो फेर कोनो फूलकुँवर के अस्मत ल लूटही। अइसन आदमी ल मौत के सजा देना चाही। फूलकुँवर के हौसला ल ओहर अतका बढ़ाइस के एक दिन फूलकुँवर हर ओला गोली मार दिस अउ भाग गे । गाँव के मन कहिथें के ओखर बर बंदूक , भागे के इंतजाम सब्बो जिनिस के योजना ल उही बनाय रिहिस।
एक जुर्म करके तहाँ ओ नक्सली मन के दल म शामिल होगे की ऊँखर संग रहे लागिस“।
अतके किस्सा ल सुन के रमा के आँखी म आँसू भर गे। कतेक होशियार लड़की, कोनो अच्छा पद म काम करही, अपन माँ-बाप के नाम ऊँचा करही कइके सोचत रेहेंव। जिनगी कब का खेल करथे कोन जानही। ओखर आघू के कहिनी हर दरपन कस उज्जर होही, ऊँखरे संग पुलिस अउ नक्सली के मुठभेड़ म मर गिस होही – रमा हर अइसन सोचिस फेर देवांगन मैडम हर ओखर सोच ले आघू के गोठ बताइस –” बिचारी फूलकुँवर हर एक ठिन गलती कर के ऊंखर चंगुल म फँस गे। रामदेव के मया एक-दू साल म पुरगे। तहाँ ओहर जम्मो झन के वासना के शिकार बने लागिस। ऊँखर खाये-पीये के व्यवस्था अउ तन के प्यास बुझाय के मशीन बन गे। जिंदगी बद ले बदतर बन गे । बाहिर निकले के कुछु रद्दा नइ दिखत रहिस फेर ओहर हार नइ मानिस। बहुत बहादुर लड़की रिहिस ओहर, एक झन साथी अउ पुलिस के मदद ले नक्सली मन ल पकड़वाय के उही इंतजाम करिस। ओहर जानत रिहिस के एमा ओखरो जान जा सकत हे फेर मरत -मरत ओहर बने काम करना चाहत रिहिस। माटी बर अपन कर्तव्य ल ओहर पूरा कर दिस।”
“ तभे ओखर चेहरा म अतेक शांति नजर आत रिहिस “
ओखर आखरी फोटो के सुरता करत रमा हर तको मने मन ओखर आत्मा के शांति बर भगवान ले प्रार्थना करिस।
[ • प्रगतिशील जन-विचारधारा की साहित्यिक संस्था ‘आरंभ’ की सक्रिय सदस्य डॉ. दीक्षा चौबे की हिंदी-छत्तीसगढ़ी में रचनाएं देश की तमाम पत्र-पत्रिकाओं एवं आकाशवाणी में निरंतर प्रकाशित-प्रसारित हो रही हैं. •’छत्तीसगढ़ आसपास’ की नियमित सुस्थापित लेखिका डॉ. दीक्षा चौबे की इस अंक में छत्तीसगढ़ कहिनी ‘फूलकुँवर’ पढ़ें और अपनी प्रतिक्रिया से अवगत कराएं. – संपादक]
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