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रवींद्र-नज़रूल की सांस्कृतिक चेतना का भव्य रंग : खचाखच भरे सभागार में 160 कलाकारों ने दी मनमोहक प्रस्तुति, भिलाई के 16 कलाकारों ने अर्पित की सुरांजलि

👉 • कार्यक्रम की मुख्य अतिथि संगीत शिल्पी अनुष्या मुखर्जी, रवींद्र संगीत गायक श्रीकांत आचार्य एवं गायक प्रबुद्ध राहा थे
• छत्तीसगढ़ आसपास
• भिलाई
रवींद्रनाथ ठाकुर और काज़ी नज़रुल इस्लाम की कालजयी रचनाओं, संगीत, नृत्य और काव्य चेतना को समर्पित भव्य संगीत-नृत्य आलेख्य ‘सुरेर कैनवासे’ का आयोजन रविवार को रवींद्र भवन, दमदम, कोलकाता में अत्यंत गरिमापूर्ण वातावरण में हुआ। वैष्णवघाटा साधना, कोलकाता द्वारा आयोजित इस सांस्कृतिक संध्या में सभागार दर्शकों से खचाखच भरा रहा। लगभग 160 कलाकारों ने गीत, नृत्य, आवृत्ति, वाद्य संगत और भाष्य के माध्यम से दोनों महाकवियों की सृजनात्मक चेतना को प्रभावशाली ढंग से मंच पर साकार किया।
विशिष्ट अतिथियों की गरिमामयी उपस्थिति-

कार्यक्रम के मुख्य अतिथि के रूप में वरिष्ठतम संगीत शिल्पी अनुषुइया मुखर्जी उपस्थित रहीं। वहीं विशिष्ट अतिथि के रूप में रवीन्द्र संगीत गायक श्रीकांत आचार्य एवं रवीन्द्र संगीत तथा नज़रुल संगीत के प्रख्यात गायक प्रबुद्ध राहा की गरिमामयी उपस्थिति रही। इन प्रतिष्ठित कलाकारों की उपस्थिति ने आयोजन की गरिमा को और बढ़ाया।
वरिष्ठ और युवा कलाकारों का अद्भुत संगम-

कार्यक्रम की सबसे उल्लेखनीय विशेषता विभिन्न पीढ़ियों के कलाकारों की सामूहिक सहभागिता रही। एक ओर अनुभवी एवं वरिष्ठ कलाकारों ने अपनी परिपक्व प्रस्तुतियों से रवींद्र-नज़रुल की रचनाओं को स्वर दिया, वहीं दूसरी ओर युवा कलाकारों ने अपनी ऊर्जा और प्रतिभा से मंच को नई जीवंतता प्रदान की।
रामकृष्ण मिशन स्कूल, नरेंद्रपुर के 15 युवा गायकों सहित लगभग 10 अन्य युवा गायकों ने भी अपनी प्रतिभा का प्रभावशाली प्रदर्शन किया। मंच पर 70–75 वर्ष की आयु के अनुभवी गायकों के साथ करीब 15 वर्ष के युवा कलाकारों की सहभागिता विशेष रूप से उल्लेखनीय रही। वरिष्ठ स्वरों की परिपक्वता और युवा कंठों की ऊर्जा का यह संगम कार्यक्रम के सबसे भावपूर्ण पक्षों में से एक रहा। यह दृश्य इस बात का सुंदर उदाहरण बना कि संगीत की साधना पीढ़ियों के अंतर को मिटाकर परंपरा को निरंतर आगे बढ़ाती है।
भिलाई के 16 कलाकारों ने अर्पित की सुराजंलि-

कार्यक्रम में भिलाई की सांस्कृतिक संस्था ‘रवींद्र सुधा’ की विशेष सहभागिता रही। संगीत गुरु श्री विश्वजीत सरकार के नेतृत्व में भिलाई के 16 गायक-गायिकाओं ने रवींद्रनाथ ठाकुर और काज़ी नज़रुल इस्लाम की कालजयी रचनाओं के माध्यम से दोनों महाकवियों को भावपूर्ण सुरांजलि अर्पित की।
भिलाई के कलाकारों में संचयिता राय, दीपान्निता पाल, अनिता मुखर्जी, सुचिता मुखर्जी, सुमिता डे, महुआ भौमिक, आल्पना तालुकदार, बनानी विश्वास, संगीता चटर्जी, प्रतिमा दरीपा, सोमा राय, भाश्वती बोस, श्रावणी दास, सुतापा पात्र, रनबीर पाल एवं मणिमय मुखर्जी शामिल रहे।
इन कलाकारों की सामूहिक प्रस्तुति में रवींद्र संगीत की आत्मीयता और नज़रुल गीतों की ओजपूर्ण एवं विद्रोही चेतना का सुंदर संगम देखने को मिला। कोलकाता के प्रतिष्ठित सांस्कृतिक मंच पर भिलाई के कलाकारों की यह सहभागिता छत्तीसगढ़ की सांस्कृतिक धरती की ओर से एक भावपूर्ण अभिवादन के रूप में सामने आई।
नृत्यांगनाओं की भावपूर्ण अभिव्यक्ति ने मोहा मन
कार्यक्रम की नृत्य प्रस्तुतियां भी विशेष आकर्षण का केंद्र रहीं। नृत्यांगनाओं की भावपूर्ण और सहज अभिव्यक्ति, सधी हुई भाव-भंगिमाओं, लय-ताल पर साधे कदमों और मनोहारी नृत्य-सौंदर्य ने रवींद्र और नज़रुल की रचनाओं में निहित भावों को दृश्य रूप प्रदान किया।
उनकी प्रस्तुतियों में संगीत के साथ भाव, गति और सौंदर्य का सुंदर संतुलन दिखाई दिया, जिसने दर्शकों को रचनाओं के भावलोक से जोड़ दिया। नृत्य के माध्यम से प्रस्तुत सांस्कृतिक चेतना ने पूरे कार्यक्रम को एक बहुआयामी कलात्मक अनुभव में बदल दिया।
प्रभावशाली भाष्य और संचालन ने बांधे रखा दर्शकों को
‘सुरेर कैनवासे’ की प्रस्तुति को अर्थपूर्ण और प्रभावशाली बनाने में सतीनाथ बंदोपाध्याय के भाष्य तथा तनुश्री के एंकर एवं भाष्य की महत्वपूर्ण भूमिका रही। दोनों ने कार्यक्रम की विषयवस्तु, रवींद्र-नज़रुल की रचनाओं के भाव और प्रस्तुतियों के बीच सुंदर सेतु का कार्य किया।
सधे हुए मंच संचालन, प्रभावशाली भाष्य और प्रस्तुतियों के बीच सहज तालमेल ने कार्यक्रम की निरंतरता बनाए रखी तथा दर्शकों को प्रत्येक प्रस्तुति के भाव और संदर्भ से जोड़े रखा।
संगीत, नृत्य, गायन और वाद्य संगत का सुंदर समन्वय
कार्यक्रम की सफलता में संगीत, नृत्य, गायन, वाद्य संगत, भाष्य और प्रभावशाली मंच संचालन का सुंदर समन्वय महत्वपूर्ण रहा। प्रत्येक प्रस्तुति को क्रमबद्ध और गरिमापूर्ण ढंग से प्रस्तुत किया गया, जिससे कार्यक्रम की गति, सौंदर्य और प्रभाव लगातार बना रहा।
वरिष्ठ कलाकारों की परिपक्व प्रस्तुतियां, युवा कलाकारों का उत्साह, नृत्यांगनाओं की भाव-अभिव्यक्ति, वाद्य कलाकारों की सधी हुई संगत तथा मंच संचालन ने मिलकर ऐसा सांस्कृतिक वातावरण निर्मित किया, जिसमें रवींद्र और नज़रुल की रचनात्मक आत्मा जीवंत होती महसूस हुई।
भिलाई की सहभागिता बनी विशेष आकर्षण
संगीत गुरु श्री विश्वजीत सरकार के मार्गदर्शन में भिलाई के कलाकारों की प्रस्तुति ने आयोजन में छत्तीसगढ़ की सांस्कृतिक उपस्थिति को सशक्त बनाया। पूर्वी और मध्य भारत के विभिन्न क्षेत्रों से आए कलाकारों की सहभागिता ने ‘सुरेर कैनवासे’ को व्यापक सांस्कृतिक परिवार के मिलन का स्वरूप प्रदान किया।
कार्यक्रम को कोलकाता के वरिष्ठ कलाकार सतीनाथ मुखोपाध्याय मिताली बैनर्जी एवं विश्वजीत बंदोपाध्याय के संयोजन एवं मार्गदर्शन से संवारा गया। विभिन्न शहरों से जुड़े कलाकारों की सहभागिता ने आयोजन की सांस्कृतिक विविधता को और समृद्ध किया।
दो महाकवियों को सामूहिक कलात्मक प्रणति
‘सुरेर कैनवासे’ केवल एक सांस्कृतिक कार्यक्रम नहीं, बल्कि रवींद्रनाथ ठाकुर और काज़ी नज़रुल इस्लाम की साझा सांस्कृतिक विरासत को समर्पित एक जीवंत कलात्मक प्रणति बनकर सामने आया। एक ओर वरिष्ठ कलाकारों के अनुभव और स्वर की परिपक्वता थी, तो दूसरी ओर युवा पीढ़ी की ऊर्जा और सीखने की ललक-इन दोनों का मिलन कार्यक्रम की विशेष उपलब्धि रहा।
रवींद्र नाथ के गीतों की कोमल भावधारा, नज़रुल की ज्वलंत चेतना, नृत्य की भाव-भंगिमाएं, वाद्य संगत की लय, प्रभावशाली भाष्य और कलाकारों की सामूहिक साधना ने खचाखच भरे सभागार में ऐसा वातावरण निर्मित किया, जो लंबे समय तक दर्शकों की स्मृतियों में बना रहेगा।
‘सुरेर कैनवासे’ ने यह संदेश दिया कि महान रचनाकारों की सांस्कृतिक विरासत तभी जीवंत रहती है, जब उसे अगली पीढ़ी उसी श्रद्धा, संवेदना और सृजनात्मकता के साथ आगे बढ़ाती है।
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