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लेख : संप्रदायवाद से मानवतावाद की ओर- कैलाश जैन बरमेचा

👉 • आज भी मनुष्य जाति, ऊंच-नीच, अमीरी-गरीबी और धार्मिक संकीर्णताओं की जंजीरों में बंधा हुआ है. ऐसे समय में समाज को सबसे अधिक आवश्यकता उस सोच की है जो मनुष्य को केवल ‘मनुष्य’ के रूप में देखना सिखाए…
आज पूरा विश्व संप्रदायवाद, वैचारिक संघर्षों और सामाजिक विभाजनों के दौर से गुजर रहा है। धर्म, जाति, भाषा और संप्रदाय के नाम पर मनुष्य-मनुष्य के बीच ऐसी दूरियाँ खड़ी कर दी गई हैं, जिनसे समाज का ताना-बाना लगातार कमजोर होता जा रहा है। राजनीति भी अनेक बार इन्हीं भावनाओं की आड़ लेकर अपने समीकरण साधने में लगी दिखाई देती है। परिणामस्वरूप मानवता पीछे छूटती जा रही है और संकीर्ण सोच आगे बढ़ती जा रही है।
प्रत्येक धर्म और संप्रदाय के अपने संत, महात्मा और आध्यात्मिक मार्गदर्शक हैं। वे प्रेम, शांति, सद्भाव और मानवता का संदेश भी देते हैं। किंतु प्रश्न यह है कि क्या समाज वास्तव में उन शिक्षाओं को अपने दैनिक जीवन में उतार पा रहा है? यदि मनुष्य के व्यवहार में प्रेम, समानता और करुणा दिखाई नहीं देती, तो केवल उपदेशों से समाज का वास्तविक परिवर्तन संभव नहीं हो सकता।
आज भी मनुष्य जाति, ऊँच-नीच, अमीरी-गरीबी और धार्मिक संकीर्णताओं की जंजीरों में बंधा हुआ है। ऐसे समय में समाज को सबसे अधिक आवश्यकता उस सोच की है जो मनुष्य को केवल “मनुष्य” के रूप में देखना सिखाए। जब तक व्यक्ति स्वयं से ऊपर उठकर दूसरों के सुख-दुख को समझना नहीं सीखेगा, तब तक मानवता का वास्तविक विकास संभव नहीं हो पाएगा।
भारत की सबसे बड़ी विशेषता उसकी विविधता है। यहाँ अनेक धर्म, भाषाएँ, संस्कृतियाँ और परंपराएँ एक साथ जीवित हैं। इसी विविधता को एक सूत्र में बाँधने का कार्य भारत के संविधान ने किया है। बाबा साहेब डॉ. भीमराव अंबेडकर द्वारा निर्मित संविधान केवल कानूनों का दस्तावेज नहीं है, बल्कि सामाजिक समानता, मानवाधिकार और मानवीय गरिमा का महान घोषणापत्र है।
संविधान हमें यह सिखाता है कि इस देश में प्रत्येक व्यक्ति समान है। किसी का मूल्य उसकी जाति, धर्म या आर्थिक स्थिति से नहीं, बल्कि उसके मानवीय गुणों और नागरिक कर्तव्यों से तय होना चाहिए। यदि हम वास्तव में संविधान की आत्मा को अपने जीवन में उतार लें, तो समाज में फैली अनेक विषमताएँ स्वतः समाप्त हो सकती हैं।
दुर्भाग्य यह है कि आज संविधान की बातें तो बहुत होती हैं, लेकिन उसके मूल भाव — समानता, बंधुत्व और मानवता — को जीवन में उतारने का प्रयास बहुत कम दिखाई देता है। जबकि डॉ. अंबेडकर ने “बंधुत्व” को लोकतंत्र की आत्मा माना था। बंधुत्व का अर्थ केवल साथ रहने से नहीं, बल्कि एक-दूसरे को सम्मान, अपनत्व और सुरक्षा का एहसास कराने से है।
समाज का वास्तविक विकास तब होगा जब मनुष्य अपने “मैं” से ऊपर उठकर “हम” की भावना को स्वीकार करेगा। जब व्यक्ति अपने भीतर के अहंकार को नियंत्रित करके दूसरों के प्रति प्रेम, संवेदना और सहयोग की भावना विकसित करेगा। क्योंकि मानवता का सबसे सुंदर रूप वही है जहाँ कोई छोटा-बड़ा नहीं होता, कोई ऊँच-नीच नहीं होती, बल्कि सभी एक माला के मोतियों की तरह जुड़े रहते हैं।
आज आवश्यकता किसी नए संघर्ष की नहीं, बल्कि नए विचारों की है। आवश्यकता इस बात की है कि हम धर्म को विभाजन का माध्यम न बनाकर मानवता का मार्ग बनाएं। जब समाज में प्रेम, संवाद, संवेदना और समानता का वातावरण बनेगा, तभी वास्तविक अर्थों में एक सशक्त, सभ्य और विकसित भारत का निर्माण संभव होगा।

[ • कैलाश जैन बरमेचा, प्रगतिशील जन-विचारधारा की साहित्यिक संस्था ‘आरंभ’ के मुख्य संरक्षक हैं. ]
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