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  • विशेष : अमेरिका प्रवासी मजदूरों का कैसे इस्तेमाल करता है? – शिरीन अख्तर

विशेष : अमेरिका प्रवासी मजदूरों का कैसे इस्तेमाल करता है? – शिरीन अख्तर

2 years ago
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निर्वासन का शस्त्रीकरण नवउदारवादी नीतियों का हिस्सा है, जो असमानता पैदा करती है, सत्ताधारी अभिजात वर्ग के हितों की सेवा करती है, लोगों को काम की तलाश में पलायन करने के लिए मजबूर करती है और उनके आने के बाद उन्हें अपराधी बना देती है।

अमेरिकी अर्थव्यवस्था अप्रवासी मजदूरों के दशकों के पसीने और मेहनत पर बनी है, खासकर कम वेतन वाले उद्योगों जैसे कि कृषि, निर्माण और सेवा क्षेत्र में। ये श्रमिक ऐसे उद्योगों को चलाते हैं, जो कम से कम कानूनी सुरक्षा के साथ सस्ते, आसानी से बदले जा सकने वाले श्रम पर निर्भर करते हैं। उनके योगदान के बावजूद, राजनीतिक रूप से सुविधाजनक होने पर अप्रवासियों को शैतान की तरह पेश किया जाता है। एक बार जब उनके श्रम की आवश्यकता नहीं रह जाती है, तो उन्हें “अवैध” करार दिया जाता है और कठोर निर्वासन नियमों के अधीन कर दिया जाता है।

श्रम, शोषण और निर्वासन का यह चक्र कोई दुर्घटना नहीं है, यह मजदूरी को दबाने और श्रम अधिकारों को मजबूत होने से रोकने के लिए जानबूझकर बनाई गई एक व्यवस्था है। प्रतिबंधात्मक वीज़ा नीतियों, कानूनी सुरक्षा की कमी या निर्वासन के निरंतर खतरे के जरिए अप्रवासी श्रमिकों में अनिश्चितता बनाए रखकर मज़दूरी कम रखी जाती है और श्रमिक बेहतर परिस्थितियों की मांग करने में असमर्थ होते हैं।

नियोक्ता इस असुरक्षा से लाभ उठाते हैं। उचित मज़दूरी, स्वास्थ्य सेवा या नौकरी की सुरक्षा जैसे दायित्वों से बचते हुए अधिकतम उत्पादकता हासिल करते हैं। जब प्रवासी स्थिरता स्थापित करने का प्रयास करते हैं, तो राज्य उन्हें अपराधी बनाकर इस प्रणाली को लागू करता है, यह सुनिश्चित करता है कि वे निर्भरता और जोखिम के चक्र में फंसे रहें।

अमेरिकी निर्वासन प्रणाली एक तटस्थ प्रवर्तन तंत्र होने से बहुत दूर है, यह एक गहरी आर्थिक और राजनीतिक रणनीति है, जो सत्तारूढ़ अभिजात वर्ग के हितों की सेवा करती है, जबकि श्रमिक वर्ग के प्रवासियों को तबाह करती है। “अवैध अप्रवासी” का लेबल एक सावधानीपूर्वक बनाया गया राजनीतिक टूल है, जिसे न केवल राष्ट्रवादी चिंताओं को भड़काने के लिए, बल्कि संरचनात्मक आर्थिक विफलताओं और अवसरवादी शासन से ध्यान हटाने के लिए भी तैयार किया गया है। सीमा सुरक्षा की बयानबाजी के पीछे शोषण, मुनाफ़ा कमाने और प्रणालीगत अमानवीयकरण की क्रूर मशीनरी छिपी हुई है।

निर्वासन का उपयोग राजनीतिक ध्यान भटकाने के रूप में

जब अमेरिका आर्थिक मंदी या राजनीतिक संकट का सामना करता है, तो अप्रवासी आसानी से बलि का बकरा बन जाते हैं। निर्वासन बढ़ता है, और सरकार इस मुद्दे को आर्थिक निर्भरता के बजाय राष्ट्रीय सुरक्षा के रूप में पेश करती है। इससे नीति निर्माताओं को विफल आर्थिक नीतियों, कॉर्पोरेट कर छूट और बढ़ती आय असमानता से ध्यान हटाने का मौका मिलता है।

वर्तमान अमेरिकी प्रशासन ने उचित प्रक्रिया के बिना बड़े पैमाने पर निर्वासन को सही ठहराने के लिए 1798 के विदेशी शत्रु अधिनियम को लागू करने का प्रस्ताव दिया है। इस प्रकार “सीमा सुरक्षा” के विचार को राष्ट्रीय हितों की रक्षा के लिए नहीं, बल्कि नस्लीय और आर्थिक पदानुक्रम को मजबूत करने के लिए हथियार बनाया जाता है। इन नीतियों के असली लाभार्थी वे कामकाजी वर्ग के अमेरिकी नागरिक नहीं हैं, जिनकी वे रक्षा करने का दावा करते हैं, बल्कि वे कॉर्पोरेट अभिजात वर्ग हैं, जो अनिर्दिष्ट श्रम की अनिश्चित स्थितियों से लाभ कमाते हैं।

बड़े पैमाने पर निर्वासन अरबों डॉलर का उद्योग बन गया है। निजी हिरासत केंद्र, जैसे कि कोरसिविक और जीईओ ग्रुप द्वारा संचालित, निर्वासन से पहले प्रवासियों को रखने के लिए आकर्षक सरकारी अनुबंध प्राप्त करते हैं। जितने अधिक समय तक कोई व्यक्ति हिरासत में रहता है, ये कंपनियां उतना ही अधिक लाभ कमाती हैं। ये सुविधाएं अमानवीय स्थितियों, भीड़भाड़, इलाज की कमी और दुर्व्यवहार की रिपोर्टों के लिए विवादास्पद हैं।

निर्वासन-औद्योगिक परिसर का विस्तार यह सुनिश्चित करता है कि हिरासत को अनावश्यक रूप से लंबा किया जाए, जिससे प्रवासी पीड़ा एक व्यवसाय मॉडल में बदल जाए। आव्रजन प्रवर्तन में निजी निगमों की भागीदारी का मतलब है कि निर्वासन नीतियां मानवाधिकारों या कानूनी प्रक्रिया के बजाय लाभ के उद्देश्यों से निर्धारित होती हैं।

अंतर्राष्ट्रीय मानवाधिकार कानून का उल्लंघन

प्रवासियों को निर्वासित करने के लिए हाल ही में सैन्य विमानों का इस्तेमाल, जैसे कि इक्वाडोर के लोगों को ले जाने वाला सी-17 सैन्य विमान, आव्रजन प्रवर्तन के पूर्ण सैन्यीकरण की ओर एक खतरनाक बदलाव का संकेत देता है। निर्वासन अब एक प्रशासनिक प्रक्रिया नहीं है, बल्कि अब एक सुरक्षा-राज्य तंत्र का हिस्सा है।

प्रवासियों को नागरिकों के बजाय दुश्मन लड़ाकों के रूप में देखते हुए, यह नीति नागरिक शासन और सैन्य अभियानों के बीच के अंतर को मिटा देती है। कमज़ोर लोगों को निर्वासित करने के लिए सैन्य विमानों का इस्तेमाल अप्रवासी समुदायों को एक स्पष्ट संदेश भेजता है : उनकी उपस्थिति न केवल अवांछित है, बल्कि इसे राष्ट्रीय खतरे के रूप में माना जाता है।

नाटकीय निर्वासन, जिसमें अत्यधिक प्रचारित छापों में किए गए सामूहिक निष्कासन शामिल हैं, अति दक्षिणपंथी राष्ट्रवादी मतदाताओं को आकर्षित करने के लिए प्रचार के रूप में काम करते हैं। क्रूर और नाटकीय तरीकों से निर्वासन को बढ़ावा देने से नागरिक निर्वासन को एक राजनीतिक तमाशा बनाने में मदद मिलती है, जिससे यह धारणा मजबूत होती है कि सामाजिक और आर्थिक संकटों के लिए अप्रवासी ही ज़िम्मेदार हैं।

निर्वासन प्रक्रिया तेज़ी से हिंसक और अपमानजनक होती जा रही है, जिसमें प्रवासियों को हथकड़ी, बेड़ियां लगाई जा रही हैं और उनके साथ अपराधियों जैसा व्यवहार किया जा रहा है। रिपोर्ट में निर्वासितों के भयावह अनुभवों का विवरण दिया गया है, अमृतसर के लिए एक अमेरिकी सैन्य विमान से निर्वासित 104 भारतीय प्रवासियों को पूरे 40 घंटे की यात्रा के दौरान जंजीरों में जकड़ा गया था।

यह कार्यवाही कई अंतर्राष्ट्रीय समझौतों का उल्लंघन करती हैं : जैसे,

* मानवाधिकारों की सार्वभौमिक घोषणा, 1948 क्रूर, अमानवीय या अपमानजनक व्यवहार (अनुच्छेद 5) को प्रतिबंधित करती है।

* नागरिक और राजनीतिक अधिकारों पर अंतर्राष्ट्रीय कंवेनेंट मनमाने ढंग से हिरासत में रखने और अमानवीय व्यवहार को प्रतिबंधित करती है।

* टॉर्चर के खिलाफ संयुक्त राष्ट्र सम्मेलन राज्य द्वारा स्वीकृत क्रूरता के कृत्यों की निंदा करता है।

इन समझौतों पर हस्ताक्षर करने के बावजूद, अमेरिका अपनी निर्वासन नीतियों में अपनी प्रतिबद्धताओं की खुलेआम धज्जियां उड़ाता है। यह सच्चाई कि प्रवासियों को बेड़ियों में जकड़ा जाता है, इलाज से वंचित किया जाता है और निर्वासन से पहले लंबे समय तक हिरासत में रखा जाता है, यह साफ करता है कि ये प्रशासनिक प्रक्रियाएं नहीं हैं, बल्कि उत्पीड़न के सुनियोजित कार्य हैं।

भारत की चुप्पी

वर्तमान निर्वासन संकट के सबसे परेशान करने वाले पहलुओं में से एक अपने ही लोगों के खिलाफ मानवाधिकारों के घोर उल्लंघन के बावजूद भारत सरकार की चुप्पी है। निर्वासन के दौरान भारतीय प्रवासियों के साथ अमानवीय व्यवहार, जंजीरों और बेड़ियों में जकड़े जाने के बावजूद, भारतीय राज्य कोई सख्त प्रतिक्रिया देने में विफल रहा है।

जबकि मेक्सिको, इक्वाडोर और अन्य देशों ने अपने निर्वासित नागरिकों के साथ किए गए व्यवहार का विरोध किया है, भारत निष्क्रिय बना हुआ है। क्रूर परिस्थितियों में 104 भारतीय प्रवासियों के निर्वासन का कोई आधिकारिक विरोध नहीं हुआ, कोई कूटनीतिक दबाव नहीं था और अमेरिका को जवाबदेह ठहराने का कोई प्रयास नहीं किया गया।

अमेरिका की क्रूर निर्वासन तरीकों पर भारत की चुप्पी भू-राजनीतिक, आर्थिक और राजनीतिक कारकों के जुड़ाव से उपजी है। नरेंद्र मोदी सरकार ने रणनीतिक रूप से खुद को अमेरिकी हितों के साथ जोड़ लिया है, विशेष रूप से चीन का मुकाबला करने में, और भारतीय प्रवासियों के खिलाफ मानवाधिकारों के उल्लंघन पर वाशिंगटन को चुनौती देकर इस गठबंधन को जोखिम में डालने को तैयार नहीं है। यह कूटनीतिक गणना विदेश में अपने नागरिकों के कल्याण पर रणनीतिक साझेदारी को प्राथमिकता देती है।

इसके अलावा, भारतीय सरकार चयनात्मक तरीके से नाराजगी दिखाती है। पश्चिमी देशों में छात्रों और उच्च-कुशल पेशेवरों को प्रभावित करने वाले मुद्दों पर चिंता जताती है, जबकि कामकाजी वर्ग के प्रवासियों की दुर्दशा को अनदेखा करती है, जिनके योगदान को अक्सर कम करके आंका जाता है। यह प्रवासी समुदाय के गहरे पाखंड को दर्शाता है, जहां भारत अपने वैश्विक प्रवासी समुदाय का जश्न तब मनाता है, जब इससे धन प्रेषण और सॉफ्ट पावर जैसे आर्थिक और राजनीतिक हितों को लाभ होता है, लेकिन जब कमज़ोर प्रवासियों को दुर्व्यवहार का सामना करना पड़ता है, तो उन्हें छोड़ देता है।

अमेरिका की अमानवीय निर्वासन नीतियों को चुनौती देने से इंकार करके, भारत मौन रूप से अपने ही लोगों के अमानवीयकरण का समर्थन करता है। यह चुप्पी एक स्पष्ट संदेश देती है : भारतीय प्रवासी तब मूल्यवान होते हैं, जब वे घर वापस पैसा भेजते हैं, लेकिन जब उन्हें सुरक्षा की आवश्यकता होती है, तो वे बेकार हो जाते हैं।

मानवाधिकार संकट

निर्वासन का शस्त्रीकरण केवल अमेरिका का मुद्दा नहीं है, यह असमानता की वैश्विक प्रणाली का हिस्सा है। वही नवउदारवादी नीतियां, जो लोगों को काम की तलाश में पलायन करने के लिए मजबूर करती हैं, वही नीतियां हैं, जो उनके आने के बाद उन्हें अपराधी बनाती हैं। यदि ऐसी परिस्थितियों में निर्वासन जारी रहता है, तो वे एक खतरनाक मिसाल कायम करेंगे। अन्य राष्ट्र भी ऐसी ही नीतियां अपना सकते हैं, जिससे हाशिए पर पड़े समुदायों का सामूहिक निष्कासन अपवाद के बजाय एक आदर्श बन जाएगा।

वर्तमान अमेरिकी निर्वासन नीति नस्लीय पूंजीवाद की क्रूर अभिव्यक्ति है, जहां जरूरत पड़ने पर प्रवासियों का शोषण किया जाता है और सुविधानुसार उन्हें त्याग दिया जाता है। ये नीतियां कानून लागू करने के बारे में नहीं हैं ; ये नियंत्रण, लाभ और राजनीतिक शक्ति के बारे में हैं। अगर इन निर्वासनों को चुनौती नहीं दी गई, तो ये और भी चरम पर पहुंच जाएंगे। इनके खिलाफ लड़ाई सिर्फ अप्रवास के बारे में नहीं है, यह तेजी से शत्रुतापूर्ण दुनिया में मानवीय गरिमा और न्याय के सिद्धांतों की रक्षा के बारे में है।

अंतर्राष्ट्रीय समुदाय को एक कोई रुख अपनाना चाहिए। प्रभावित देशों की सरकारों को निष्क्रिय बने रहने से इंकार करना चाहिए। मानवाधिकार संगठनों को वैश्विक मंच पर इन उल्लंघनों को चुनौती देनी चाहिए। सबसे अहम बात यह है कि प्रवासी न्याय के लिए आंदोलनों को प्रतिरोध जारी रखना चाहिए।

👉 • आलेख की लेखिका शिरीन अख्तर, दिल्ली विश्वविद्यालय के जाकिर हुसैन कॉलेज में अर्थशास्त्र विभाग की एसोसिएट प्रोफेसर हैं

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व्यंग्य : नो हार, ओन्ली जीत ❗ – राजेंद्र शर्मा

🟥 अब तेरा क्या होगा रे बुलडोजर ❗ – व्यंग्य : राजेंद्र शर्मा.
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🟥 अब तेरा क्या होगा रे बुलडोजर ❗ – व्यंग्य : राजेंद्र शर्मा.

🟥 प्ररंपरा या कुटेव  ❓ – व्यंग्य : राजेंद्र शर्मा
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🟥 प्ररंपरा या कुटेव ❓ – व्यंग्य : राजेंद्र शर्मा

▪️ न्यायपालिका के अपशकुनी के साथी : वैसे ही चलना दूभर था अंधियारे में…इनने और घुमाव ला दिया गलियारे में – आलेख बादल सरोज.
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▪️ न्यायपालिका के अपशकुनी के साथी : वैसे ही चलना दूभर था अंधियारे में…इनने और घुमाव ला दिया गलियारे में – आलेख बादल सरोज.

▪️ मशहूर शायर गीतकार साहिर लुधियानवी : ‘ जंग तो ख़ुद ही एक मसअला है, जंग क्या मसअलों का हल देगी ‘ : वो सुबह कभी तो आएगी – गणेश कछवाहा.
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▪️ मशहूर शायर गीतकार साहिर लुधियानवी : ‘ जंग तो ख़ुद ही एक मसअला है, जंग क्या मसअलों का हल देगी ‘ : वो सुबह कभी तो आएगी – गणेश कछवाहा.

▪️ व्यंग्य : दीवाली के कूंचे से यूँ लक्ष्मी जी निकलीं ❗ – राजेंद्र शर्मा
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▪️ व्यंग्य : दीवाली के कूंचे से यूँ लक्ष्मी जी निकलीं ❗ – राजेंद्र शर्मा

25 सितंबर पितृ मोक्ष अमावस्या के उपलक्ष्य में… पितृ श्राद्ध – श्राद्ध का प्रतीक
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25 सितंबर पितृ मोक्ष अमावस्या के उपलक्ष्य में… पितृ श्राद्ध – श्राद्ध का प्रतीक

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🟢 आजादी के अमृत महोत्सव पर विशेष : डॉ. अशोक आकाश.

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🟣 अमृत महोत्सव पर विशेष : डॉ. बलदाऊ राम साहू [दुर्ग]

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🟣 समसामयिक चिंतन : डॉ. अरविंद प्रेमचंद जैन [भोपाल].

राजनीति न्यूज़

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मुख्यमंत्री भूपेश बघेल ने उदयपुर हत्याकांड को लेकर दिया बड़ा बयान

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■छत्तीसगढ़ :

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भारतीय जनता पार्टी,भिलाई-दुर्ग के वरिष्ठ कार्यकर्ता संजय जे.दानी,लल्लन मिश्रा, सुरेखा खटी,अमरजीत सिंह ‘चहल’,विजय शुक्ला, कुमुद द्विवेदी महेंद्र यादव,सूरज शर्मा,प्रभा साहू,संजय खर्चे,किशोर बहाड़े, प्रदीप बोबडे,पुरषोत्तम चौकसे,राहुल भोसले,रितेश सिंह,रश्मि अगतकर, सोनाली,भारती उइके,प्रीति अग्रवाल,सीमा कन्नौजे,तृप्ति कन्नौजे,महेश सिंह, राकेश शुक्ला, अशोक स्वाईन ओर नागेश्वर राव ‘बाबू’ ने सयुंक्त बयान में भिलाई के विधायक देवेन्द्र यादव से जवाब-तलब किया.

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भिलाई कांड, न्यायाधीश अवकाश पर, जाने कब होगी सुनवाई

धमतरी आसपास
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स्मृति शेष- बाबू जी, मोतीलाल वोरा

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छत्तीसगढ़ कांग्रेस में हलचल

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राज्यसभा सांसद सुश्री सरोज पाण्डेय ने छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री भूपेश बघेल से कहा- मर्यादित भाषा में रखें अपनी बात

मुख्यमंत्री श्री भूपेश बघेल  ने डाॅ. नरेन्द्र देव वर्मा पर केन्द्रित ‘ग्रामोदय’ पत्रिका और ‘बहुमत’ पत्रिका के 101वें अंक का किया विमोचन
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मुख्यमंत्री श्री भूपेश बघेल ने डाॅ. नरेन्द्र देव वर्मा पर केन्द्रित ‘ग्रामोदय’ पत्रिका और ‘बहुमत’ पत्रिका के 101वें अंक का किया विमोचन

मरवाही उपचुनाव
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प्रमोद सिंह राजपूत कुम्हारी ब्लॉक के अध्यक्ष बने

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ओवैसी की पार्टी ने बदला सीमांचल का समीकरण! 11 सीटों पर NDA आगे

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छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री भूपेश बघेल, ग्वालियर में प्रेस वार्ता

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अमित और ऋचा जोगी का नामांकन खारिज होने पर बोले मंतूराम पवार- ‘जैसी करनी वैसी भरनी’

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छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री, भूपेश बघेल बिहार चुनाव के स्टार प्रचारक बिहार में कांग्रेस 70 सीटों में चुनाव लड़ रही है

सियासत- हाथरस सामूहिक दुष्कर्म
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हाथरस गैंगरेप के घटना पर मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने क्या कहा, पढ़िए पूरी खबर

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पत्रकारों के साथ मारपीट की घटना के बाद, पीसीसी चीफ ने जांच समिति का किया गठन