आज पढ़ें ‘आरंभ’ साहित्यिक मंच में बांग्ला और हिंदी के सुस्थापित कवि पल्लव चटर्जी

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• पल्लव चटर्जी
पांच बांग्ला काव्य संग्रह के कृतिकार [खंडमेघ, जीवन के नाना रंग, अक्षर आलापन, समय की अनुभूति और ध्वनिमय यह जगत] पल्लव चटर्जी की कविताओं में प्रासंगिकता वैचारिकता एवं प्रगतिशीलता और भाषा-शिल्प नज़र आता है. छोटी-छोटी कविताओं में खरी-खरी बातों को रेखांकित कर देते हैं. – संपादक
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किस खिंचाव में?

दिन की रोशनी धीरे-धीरे कम हो रही है।
पिंजरों में रहने वाले
अनगिनत लोग
अब लौटकर आएँगे।
आते ही
उन सबके लिए तयशुदा भोजन की व्यवस्था
कभी होती है,
कभी नहीं होती।
उन्हें खुला छोड़ दिया गया है,
फिर भी वे पालतू बने रहते हैं।
वे अपनी सीमाओं के बाहर नहीं जाते,
बल्कि लौटकर
खुद ही अपने आपको
पिंजरे में बंद कर लेते हैं।
कभी-कभी कहीं चले भी जाएँ,
तो फिर यहीं लौट आते हैं।
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चरित्रांकन

सब कुछ जैसे बदलता जा रहा है
जीवन की राहों पर।
कोई धन के कारण,
कोई अपने दायरे में,
कोई विवशता से,
कोई अहंकार में,
और फिर
कोई अपने स्वभाव से।
लैम्पपोस्ट की मद्धिम रोशनी में
रात बिक जाती है,
मानो गूँगे-बहरे लोगों का बाज़ार लगा हो।
कितनी अवहेलना,
कितनी तिरस्कार,
कितनी उपेक्षा के बावजूद…
फिर भी
बहुत से लोग
इसी राह पर चलते रहते हैं,
खुद को बदल नहीं पाते।
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इनकी ओर से बोलेगा कौन?

दिशाहीन शिक्षा संस्थान और शिक्षा व्यवस्था,
असीमित अपेक्षाएँ—
इन दोनों के बीच पिस रही है
छात्र-छात्राओं की दयनीय ज़िंदगी।
इस व्यवस्था में आमूलचूल परिवर्तन की आवश्यकता है।
आक्रोश का वास्तविक कारण क्या है?
असफलता किसकी है?
इनकी ओर से बोलेगा कौन?
इसका समाधान कौन करेगा?
उत्तर की प्रतीक्षा में हैं सभी।
[ • कवि पल्लव चटर्जी प्रगतिशील जन-विचारधारा की साहित्यिक संस्था ‘आरंभ’ के आंतरिक अंकेक्षण एवं आजीवन संस्थापक सदस्य हैं. ]
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chhattisgarhaaspaas
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