आरंभ साहित्यिक मंच : दीप्ति श्रीवास्तव

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• सावन और सड़क

हम आटो की कर रहे थे सवारी
नेशनल हाईवे पर सरपट दौड़ती
सावन का मजा दुगना कर रही थी
फुहारे हवा संग रोमांस करती
रोड़ बिलकुल मक्खन सी चिकनी
हम सोच ही रहे थे—”वाह! क्या सफर है!”
किसे पता था, आगे गड्ढों का कहर है।
इसका मजा ज्यादा देर न ले पाए
वहीं ऑटो इतनी जोर से उछली
कमर कर गई सड़क की चुगली
तब रीढ़ की हड्डी ने बजाई ताली
यहां बारिश ने सड़क से
इतना प्रेम जताया
कि बेचारी रोड़ की देह पर
जगह जगह पड़ गए फफोले
गड्ढों के कारण लगी बेचारी रोने
कीचड़ पानी ने मलहम लगाया
इतने गड्ढे की बेचारी ऑटो
एक चक्का इधर रखती
तो दूसरा गड्ढे में
बैलेंस का तो कहना ही क्या
राम राम जपने लगे
आटो चालक से बोले
हम उतर कर पैदल जाते
वो बोला अजी हम में चार
चक्कर इसी रोड पर लगाते
उसका आत्मविश्वास देख
हमें आया हौसला
उतने में बाजू से निकली कार
ब्रांडेड कपड़ों को देती मात
कीचड़ के छींटे की कर गई कारीगरी
यह थी आधुनिक चित्रकारी
जरा सम्हालते दूसरी गाड़ी बाजू से निकली ,
कीचड़ का रसगुल्ला मुंह में खिला गई
तब समझ आया सावन का यही था मुफ़्त उपहार
कीचड़ का फेस पैक बना उपहास।

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• सावन में पावस

सावन आया, पावस लाया
जीवन में आशा की सुनहरी आभा फैलाया
सबके लिए भोजन-थाल सजाया
दादुर नाचे पावस देख
जमात सारी झूम-झूम गाए
टर्र-टर्र का संगीत बजाए
मेघ-मल्हार राग वह गाये
खेतों में पानी भर आया
मेड़ों पर दादुर ने डेरा जमाया
आँखें मिच मिच दुनिया देखे
दूर बैठा दुश्मन न देखे
झपट पड़ा वह ऐसे भाई,
जैसे जन्मों की भूख हो आई!
पावस आई पावस आई
बिन मेहनत भोजन-थाल सजाई
सर्प बड़े हर्षाए
बिन मेहनत भोजन जो पाए
झुरमुट में रेंगते जाए
लम्बी चोटी सा बदन
चील की पैनी नजर से
कहां तक बच पाएं!
ऊंची उड़ान भरती चील
अचानक झट नीचे आई
चोंच में सर्प राज को दबोच
आकाश की ओर उड़ चली भाई!
पावस आई, पावस आई
सबके लिए भोजन-थाल सजाई
खेतों में रोपा लहराया
हरियाली ने रंग जमाया
केंचुए जड़ों में रेंगने लगे
माटी के संग खेलने लगे
कहीं केकड़ा पंजे फैलाए,
केंचुए को बाहों में लाए!
खेत हंसकर फरमाया
अरे भाई! इन्हें मत सताना
ये तो करते मेरी प्राकृतिक जुताई
मिट्टी को भुरभुरा बनाते
जड़ों तक हवा-पानी पहुंचाते।
केंचुए को छोड़ो मेरे भाई
पावस सबकी करती भलाई!
फिर खेत ने बात समझाई
यह बात कभी न भूलना भाई
हलधर ने भी मेहनत खूब लगाई
पावस ने जब उसका साथ निभाया
तब जाकर रोपा मुस्कुराया
धरती ने हरियाली ओढ़ी
फसलों ने नई अंगड़ाई ली
सौंधी-सौंधी माटी ने
चहुँ ओर परिमल फैलाई
सावन आया, पावस लाया
धरती का मन खूब हुलसाया
दादुर, सर्प, चील, केंचुआ
सबका अपना हिस्सा आया
प्रकृति ने ऐसा खेल रचाया
सबके लिए भोजन-थाल सजाया।

[ • प्रगतिवादी लेखिका दीप्ति श्रीवास्तव प्रगतिशील जन-विचारधारा की साहित्यिक संस्था ‘आरंभ’ की आजीवन संस्थापक सदस्य एवं प्रबंध-कार्यकारिणी समिति में उपाध्यक्षा हैं. ]
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