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साहित्यनामा – डॉ. दीक्षा चौबे

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• महतारी के पीरा

डुबकी मार समंदर भीतर, मनखे मोती पाथे।
महतारी होए के पाछू , माँ के पीर जनाथे।।
होत बिहनिया पानी कांजी, राँधय गढ़य खवावय।
तोरा कर-कर भात परोसय, बाँचे खुचे ल पावय।
सबके दुख सुख गोठ पुछइया, दुख कब अपन बताथे।।
महतारी होए के पाछू, माँ के पीर जनाथे।।
माँ ले सबो तिहार परब हे, माँ ले मइके होथे।
माँ नइहे तो सुन्ना अँगना, आँखी भर-भर रोथे।
ममता के कोठी ले सुरता, सँकरी खोलत आथे।।
महतारी होए के बाद म, माँ के पीर जनाथे ।।
नौ महीना कोख मा रखथे, पीरा ला सहिथे भारी।
लालन पालन गजब मया दय, तुम देथव माँ के गारी।
माँ के अस अपमान देख के, जिवरा बड़ करलाथे।।
महतारी होए के बाद म, माँ के पीर जनाथे।।
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• नवा सबेरा आही

सोच-फिकिर ल काबर करथव , दुख के साँझ पहाही ।
नवा सुरुज उगही जिनगी मा, नवा सबेरा आही ।।
दिया नानकुन बरथे तब्भो , भाग जथे मुंधियारी ।
शिक्षा के उजियार बगरही , खोलव अपन दुआरी ।
सुनता के पंखा चलही ता, भूसा हर फेंकाही ।।
नवा सुरुज उगही जिनगी मा, नवा सबेरा आही ।।
खून पछीना छींच-छींच के, अन्न किसान उगाथे ।
साल भर ओ मेहनत करके, खाये पूर्ती पाथे ।
मान करव तुम करमइता के , खुसहाली उहि लाही ।।
नवा सुरुज उगही जिनगी मा, नवा सबेरा आही ।।
आघू बढ़बो मिहनत करके, जुरमिल जम्मो रहिबो ।
जाति पाति के भेद भुला के, सुख दुख संग म सहिबो ।
हमर लगन अउ मिहनत सरलग,चिखल म कँवल उगाही ।।
नवा सुरुज उगही जिनगी मा, नवा सबेरा आही ।।
[ • डॉ. दीक्षा चौबे शिक्षविद हैं. आप ‘छत्तीसगढ़ आसपास’ की नियमित लेखिका व कवयित्री हैं. ]
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