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- साहित्य सृजन परिषद् भिलाई [छत्तीसगढ़] : पावस ऋतु पर सरस काव्य गोष्ठी का एक उत्कृष्ट आयोजन-पावस एक विषय नहीं अपितु प्रत्येक के मनोभाव को प्रदर्शित करने वाला साधन है : कारगिल में देश के वीर शहीदों एवं प्रख्यात पंडवानी गायिका स्व. डॉ. तीजन बाई को मौन श्रद्धांजलि अर्पित की गई
साहित्य सृजन परिषद् भिलाई [छत्तीसगढ़] : पावस ऋतु पर सरस काव्य गोष्ठी का एक उत्कृष्ट आयोजन-पावस एक विषय नहीं अपितु प्रत्येक के मनोभाव को प्रदर्शित करने वाला साधन है : कारगिल में देश के वीर शहीदों एवं प्रख्यात पंडवानी गायिका स्व. डॉ. तीजन बाई को मौन श्रद्धांजलि अर्पित की गई

• छत्तीसगढ़ आसपास
• भिलाई-दुर्ग
इंदिरा गांधी उच्चतर माध्यमिक विद्यालय रामनगर सुपेला भिलाई-दुर्ग में 26 जुलाई को अपराह्न 2.30 बजे से 6.30 तक पावस ऋतु के अवसर पर इस संदर्भ में अनेकों रचनाओं से सरोबार होने का मौका मिला.
‘साहित्य सृजन परिषद्’ के तत्वावाधान में आयोजित इस पावस काव्य गोष्ठी की अध्यक्षता संस्कृत विद्वान आचार्य डॉ. महेशचंद्र शर्मा ने की. मुख्य अतिथि स्वामी श्री स्वरूपानंद सरस्वती महाविद्यालय की प्राचार्या डॉ. हंसा शुक्ला थीं. विशिष्ट अतिथि के रूप में मौजूद थे- प्रगतिशील जन-विचारधारा की साहित्यिक संस्था ‘आरंभ’ के अध्यक्ष- प्रदीप भट्टाचार्य, ‘भिलाई वरिष्ठ महासंघ’ के अध्यक्ष व समाजसेवी- घनश्याम कुमार देवांगन और इंदिरा गाँधी उच्चतर माध्यमिक विद्यालय के संचालक व शिक्षाविद्- काशीनाथ वर्मा.
प्रारंभ में माँ सरस्वती की पूजा अर्चना एवं दीप प्रज्ज्वलित कर कार्यक्रम की शुरूआत की गई. सरस्वती वंदना गीत गाए गए.
‘साहित्य सृजन परिषद्’ के अध्यक्ष व कवि एनएल मौर्य ‘प्रीतम’ ने शब्दों से मंचस्थ अतिथियों एवं उपस्थित रचनाकारों का सम्मान किया, स्वागत उद्बोधन के साथ परिषद् के प्रतिवेदन को भी पढ़ा.
पश्चात समस्त मंचस्थ अतिथियों एवं कवि-कवयित्रियों का पुष्पगुच्छ, पुष्प माला पहनाकर सम्मानित किया गया.
गोष्ठी का कुशल संचालन शेरो-शायरी के साथ मधुर वाणी से लोकप्रिय कवयित्री शुचि ‘भवि’ ने किया.

👉 • मंचस्थ अतिथियों के साथ संचालिका शुचि ‘भवि’
संचालिका शुचि ‘भवि’ ने परंपरा के विपरीत काव्य गोष्ठी के पूर्व अतिथियों के उद्बोधन को रखा. ऐसा अमुनन देखने को नहीं मिलता. इस नए प्रयोग को सभी ने सराहा…
शिक्षाविद् व साहित्यकार डॉ. हंसा शुक्ला ने कहा कि-
‘साहित्य सृजन परिषद्’ द्वारा आयोजित पावस काव्य गोष्ठी एक उत्कृष्ट आयोजन है. ऐसे आयोजन से जनमानस, विविध विषयों पर आव अभिव्यक्ति के लिए प्रेरित होते हैं. पावस एक विषय नहीं, अपितु प्रत्येक के मनोभाव को प्रदर्शित करने वाला साधन है.
साहित्यिक चिंतनशील घनश्याम कुमार देवांगन ने कहा कि-
साहित्यिक आयोजनों में रचनाओं को सुनना एक सुखद अनुभूति होती है. कविताओं में कवि के बरसते हुए शब्दों की फड़फड़ाहट को सुनकर महसूस होता है कि बारिश हमारे आसपास ही है.
पत्रकार-कवि प्रदीप भट्टाचार्य ने कहा कि-
देश के प्रख्यात साहित्यकार कमला प्रसाद ने एक बार एक समय में बोले थे कि साहित्य क्यों और किसके लिए? साहित्य, साहित्य के लिए या साहित्य समाज के लिए! रवींद्रनाथ टैगोर, काज़ी नज़रूल इस्लाम, प्रेमचंद, विनोद शंकर शुक्ल की रचनाएं आज भी कालजयी है. आप रोज एक रचना मत लिखें, आपकी रचना आने वाली पीढ़ी के लिए धरोहर के रूप में हों. साहित्य जल्दबाज़ी की जगह नहीं, धीरज का मुकाम है. हम हैं तो भाषा में हैं-हम होंगे तो भाषा में होंगे.
शिक्षाविद् काशीनाथ वर्मा ने कहा कि-
साहित्य से समाज में बदलाव होता है, समझ लें आपका लिखना सार्थक हो गया. हरिशंकर परसाई, नागार्जुन, मुक्तिबोध, प्रेमचंद की रचनाओं का उल्लेख किया और इनकी लेखनी को जगाने वाला साहित्य बताया.
अध्यक्षीय उद्बोधन देते हुए डॉ. महेशचंद्र शर्मा ने कहा कि-
भारत वर्ष एक कृषि प्रधान एवं ऋषि प्रधान देश है. ऋषि एवं कृषि परस्पर आधारित है. पूरे भारतीय साहित्य और संस्कृति में इसका प्रभाव देखा जा सकता है. वेद, रामायण, रामचरित मानस काव्यों में वर्षा का वर्णन रोचक एवं शिक्षाप्रद रूप से दिया गया है. समस्त कवियों की रचनाओं का भी खूबसूरती से व्याख्यान किए.
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पावस ऋतु एवं अन्य विषयों पर पढ़ी गई रचनाओं की प्रमुख पंक्तियाँ-
नवा सुरुज के नवा अंजोरी/बरातिस हे चहूँ ओर/होगे बिहिनियाँ संगी सारे/गाँव म जम्मो गली खोर…
– डॉ. नीलकंठ देवांगन
पावस ऋतु लाथे पानी/वर्षा होती है मनमानी/हरियाली ओढ़े धरती/मौसम की अदा सुहानी…
– ठाकुर दशरथ सिंह भुवाल
रहा दूर तो इस दिल को समझाया न गया/आज गुजरा करीब से तो बुलाया न गया…
– राकेश गुप्ता ‘रूसिया’
तू मेरे सुर्ख गुलशन को हरा कर दे/जमीं से आसमां का रास्ता कर दे/या बचपन की मुहब्बत का सिला दे कुछ/या इस दिल के फलक को कुछ बड़ा कर दे…
– डॉ. संजय दानी
मैं तुझसे मिलने का कोई बहाना ढुंढ लेता हूँ/घने जंगल गड़ा भूला खजाना ढुंढ लेता हूँ…
– सुशील यादव
अर्पित अर्ध्य करेगी/मन यूँ गौरव गरिमा गान लिखेगी/ बलिदानों की परंपरा और साहस का पहचान लिखेगी/लिखने को तो लिख सकते हैं प्रेम और परिहास के नग़्में/कलम हमारी मगर लिखेगी तो बस हिंदुस्तान लिखेगी…
– संध्या जैन ‘महक’
मन मानस के द्वार खोल दूँ/पावस में संगीत लिखना…
– सुमित्रा शिशिर
छन्न पकैया-छन्न पकैया, देखन पावस आए/खुशी मातगे चारों खूंटा/भुइयां घलो जड़ागे/छन्न पकैया-छन्न पकैया, पावस ऋतु के आए/धरती के छाती ह जुड़ागे, सबके मन हर्षाए…
– नीलम जायसवाल
समंदर सारे शराब होते तो सोचो, कितना बवाल होता/हकीकत सारे ख्वाब होते तो सोचो, कितना बवाल होता…
– सोनिया सोनी
चाहतों से काम लेने आ गया/फिर हुआ बदनाम लेने आ गया/श्याम का ‘अंजन’ बना दीवाना है/नाम सुबहो-शाम लेने आ गया…
– टीएन कुशवाहा ‘अंजन’
बूंद-बूंद मखमली पत्तों पर/मोती से शबनम चमकती ऐसे/भ्रम से भ्रमित नहीं होना चाहिए…
– एनएल मौर्य ‘प्रीतम’
ये धरा से धरा कुछ कहती है ये धरा/जंगल-जंगल पर्वत/तुम क्यों काट रहे हो/नदी-नरवा पोखट झरना/तुम क्यों बाँट रहे हो?
– बैकुंठ महानंद ‘देवभूई’
जो सपूत करगिल पर हुए हैं कुर्बांन/मातृभूमि हेतु उनका समर्पण है पावन/उनके ही बदौलत हम देशवासी/महफूज़ स्वतंत्र जी रहे हैं फित मन सावन…
– सुरेश कुमार बंछोर ‘अभ्यार्थी’
परिर्वतन प्रकृति का नियम है/बदलता सदैव मौसम है/जो भी मिला है हमें मुफ़्त में/ये सब उसी का रहम है…
– चंद्र बर्मन
बरसात के जैसे ही बरसने लगी आँखें/यह उसकी जुदाई का असर देख रहा हूँ/इससे भी बड़ा और अजूबा भी कोई है/बरसात में जलता हुआ घर देख रहा हूँ…
– डॉ. नौशाद अहमद सिद्दीकी ‘सब्र’
दिल के अरमान, छुपाऊँ तो छुपाऊँ कैसे/आतिशे शेक से दामन को बचाऊँ कैसे/आज दो वक़्त को रोटी के पड़े हैं लाले/नौजवां बेटी का मैं ब्याह रचाऊँ कैसे?
– हाजी रियाज खान गौहर
बाप माँ कि फ़िक्र न हो कैसी संतान है/सुख न पायेगा, जहाँ में ना-समझ नादान है…
– मो. हुसैन मजाहिर
ऋतु आते ही मिट्टी की सोंधी खुशबू आने लगती है/बारिश में गिली हो अपने रंग रूप बताने लगती है/तेरे आने से ‘नावेद’ ने सावन की बहारें देखी है/इतना ही नहीं त्योहार की हर खुशियाँ तु लाने लगती है…
– नावेद रज़ा दुर्गवी
हुस्न वालों को न दिल दो, ये भुला देते हैं/जिंदगी भर के लिए, रोग लगा देते हैं/खूब करते हैं बीमारे मुहब्बत का इलाज़/दर्द बढ़ता ही रहे, एैसी दवा देते हैं…
– इस्माईल आजाद

👉 • कवि-गीतकार त्रयम्बक राव साटकर ‘अंबर’ पावस ऋतु पर अपनी प्रतिनिधि रचना का पाठ करते हुए…

👉 • ग़ज़लकार-कवि डॉ. संजय दानी काव्य प्रस्तुति देते हुए…

👉 • गीतकार-कवि ठाकुर दशरथ सिंह भुवाल सोनपांडर काव्य पाठ करते हुए…

👉 • चर्चित ग़ज़लकार-कवि राकेश गुप्ता ‘रूसिया’ ने अपनी बेहतरीन प्रस्तुति से वाह-वाह लूटी…

👉 • ‘आरंभ’ के अध्यक्ष प्रदीप भट्टाचार्य ने अपनी बात रखते हुए बोले कि- ‘साहित्य जल्दबाज़ी की जगह नहीं, धीरज का मुकाम है’…

👉 • समाजसेवी घनश्याम कुमार देवांगन ने साहित्य पर विस्तार से अपनी बात कही…
इसके अलावा राजकुमार भल्ला ‘आर्य’, जितेंद्र कुमार वर्मा वैद्य, नीरू भल्ला, विनय कुमार की भी सहभागिता रही.


आभार प्रदर्शन ‘साहित्य सृजन परिषद्’ के सचिव टीआर कोसरिया ‘अलकरहा’ ने किया.
अंत में ‘साहित्य सृजन परिषद्’ की तरफ से कारगिल में हुए शहीदों की याद में और प्रख्यात पंडवानी लोक गायिका पद्म विभूषण डॉ. तीजन बाई को दो मिनट की विनम्र श्रद्धांजलि अर्पित की गई.
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पावस ऋतु काव्य गोष्ठी की कुछ और प्रमुख सचित्र झलकियाँ-

👉 • डॉ. हंसा शुक्ला का स्वागत किया ‘साहित्य सृजन परिषद्’ की उपाध्यक्ष नीलम जायसवाल ने…

👉 • ‘साहित्य सृजन परिषद्’ के अध्यक्ष एनएल मौर्य ‘प्रीतम’ का स्वागत किया परिषद् के संरक्षक राजकुमार भल्ला ‘आर्य’ ने…

👉 • ‘आरंभ’ के अध्यक्ष प्रदीप भट्टाचार्य का पुष्पमाला पहनाकर सम्मान किया ‘आरंभ’ के संस्थापक सदस्य राकेश गुप्ता ‘रुसिया’ ने…

👉 • डॉ. महेशचंद्र शर्मा का स्वागत किया ‘साहित्य सृजन परिषद्’ के सचिव टीआर कोसरिया ‘अलकरहा’ ने…

👉 • स्वागत उद्बोधन देते हुए ‘साहित्य सृजन परिषद्’ के अध्यक्ष एनएल मौर्य ‘प्रीतम’

👉 • आभार व्यक्त करते हुए ‘साहित्य सृजन परिषद्’ के सचिव टीआर कोसरिया ‘अलकरहा’

👉 • इस अवसर पर डॉ. संजय दानी ने अपनी बहुचर्चित ग़ज़ल संग्रह ‘चश्मे-बद् दूर’ प्रदीप भट्टाचार्य को सप्रेम भेंट किया
[ • रपट एवं फोटो संयोजन- डॉ. नौशाद अहमद सिद्दीकी ‘सब्र’ मीडिया प्रभारी- ‘साहित्य सृजन परिषद्’ ]
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