आरंभ साहित्यिक मंच : संध्या जैन

▪️
• कवयित्री संध्या जैन
प्रगतिशील जन-विचारधारा की साहित्यिक संस्था ‘आरंभ’ से जुड़ी संध्या जैन निरंतर काव्य सृजन कर रही हैं. इनकी कविता घर-परिवार पड़ोस से लेकर देश-परदेश में सांस लेती है. इनकी कविता में प्रगतिशील परंपरा से समकालीन कविता को जोड़ती हुई सार्थक रचनाशीलता की ओर ले जाती है. संध्या जैन एक संभावनाशील एवं आशावादी कवयित्री हैं, इनकी कविता में पहचान, महसूस और प्रश्ननांकित की जगह है?- संपादक
▪️
• गीत

ढले आचरण में जब “कविता”,
दीप हृदय का जल जाता है।
अंधकार के गलियारों में,
भूला पथिक संभल जाता है।
मुखरित हो जाते कोकिल स्वर
सूने सूने से उपवन में,
मन के भाव बदल जाते है,
जीवन स्वयं बदल जाता है।
सुख का हो या दुख का मौसम,
अंतस् स्वर उद्गार होता है।
हो पीड़ा या हो अति क्रंदन,
शीतल मस्तक हो जाता है।
समय बहुत गतिमान सोच से,
आगे बहुत निकल जाएगा।
सुख की चाह, मन की आशा में,
अटका भटका रह जाएगा।
उठकर पुनः सिंधु में बरसे,
बादल व्यर्थ नहीं जाता है।
अतृप्त वसुंधरा पर जो बरसे,
सावन व्यर्थ नहीं जाता है।
हे पंथी! अब पंथ मोड़ ले
मन मनके को क़ैद ना कर,
अपने शब्द और लेखनी से,
आलोकित हृदयांगन कर।
▪️
• माँ

इक तेरे रूप के ख़ातिर माँ
कितने संगमरमर रोये है,
मैं तो फिर भी इंसान हूँ
कितने अरमान पिरोये है।
औजारों की क्या बात कहुँ
निज हाथ कांपने लगते है,
रूप ना ले पाया मैं तुमसा
पत्थर भी हांफने लगते है,
इक तेरे रूप के ख़ातिर माँ
कितने संगमरमर रोये है।
ना कोई राग ना कोई द्वेष,
ना कोई ईर्ष्या ना विद्वेष
सहनशीलता की प्रतिमूर्ति तुम
बिन कहे सभी कुछ सह गई तुम
मोक्ष का पथ दिखाला देना
चरणों में शीश झुकाये है।
इक तेरे रूप के ख़ातिर माँ
कितने संगमरमर रोये है।
[ • संध्या जैन छत्तीसगढ़ भिलाई में निवासरत हैं ]
🟥🟥🟥
chhattisgarhaaspaas
विज्ञापन (Advertisement)